गरुड़ पुराण के अनुसार और दुनिया भर के धार्मिक ग्रंथों के हिसाब से २ प्रकार के जगत माने गए हैं। एक जगत जिसमें हम रहते हैं यानि कि स्थूल जगत। आसान भाषा में कहें तो ऐसा संसार जिसे हम आँखों से देख सकते हैं और एक जगत है जिसमें हमें मृत्यु के पश्चात जाना है यानि कि सूक्षम जगत। जो स्थूल आँखों से नहीं देखा जा सकता।
ग्रंथों के अनुसार ये माना जाता है कि स्थूल जगत केवल ९% ही है और सूक्षम जगत ९१%। विज्ञान की खोज ने भी ये पुष्टि की है कि २ प्रकार के जगत हैं। स्थूल जगत को विज्ञानं ने एस्ट्रल (astral world) और सूक्षम जगत को नॉन एस्ट्रल जगत (non-Astral world ) कहा है। जब हमारा शरीर नाश हो जाता है हम इस सूक्षम जगत में दाखिल होते हैं।
स्थूल संसार इतना विशाल है कि हम अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते। उदहारण कि तौर पर विज्ञानं ने नासा (NASA) द्वारा संसार की जितनी भी खोज हुई है वो 1% भी नहीं है। तो अगर हम स्थूल संसार की विशालता का अनुमान नहीं लगा सकते तो सूक्षम संसार की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती।
इस लेख में हम इसी सूक्षम संसार के एक छोटे से हिस्से के बारे में जानने की कोशिश करेंगे जिसका नाम है नरक। गरुड़ पुराण के अनुसारनर्क के भयानक रास्तों और यातनाओं का वर्णन बहुत ही विस्तार पूर्वक दिया गया है।
गरुड़ पुराण के अनुसार नर्क कितने प्रकार के हैं
गरुड़ पुराण ग्रन्थ विष्णु जी और उनके वाहन गरुड़ जी के बीच वार्तालाप के रूप में है। विष्णु जी कहते हैं के कुल 84 लाख नर्क होते हैं जिनमे से 21 ऐसे नर्क हैं जिन्हें कुम्भी नर्क कहा गया है। इन 21 नरकों में जाने वाला जीव अन्नत कल्पों तक भयानक यातनाएं भोगता है। इन 21 नरकों के नाम इस प्रकार हैं :
तामिस्त्र, लौहशंकु, महारौरव, शाल्मली, रौरव, कुड्मल, कलसूत्रक, पूतितन्त्रिक, संघात, लोहितोद, स्विश, सम्प्रतापन, महानिर्या, काकोल, संजीवन, महपथ, अवीचि, अन्धतमिस्त्र, कुम्भीपाक, सम्प्रतापान और तपन।
गरुड़ पुराण के अनुसार इन 21 महाघोर नरकों में जीव के कर्मो के हिसाब से भयानक यातनाएं दी जाती हैं। इन नरकों में वही जीव आते हैं जो महा पापी होते हैं और लम्बे समय के लिए यहाँ कैद हो जाते हैं। एक बार जो जीव इन नरकों में आ जाता है उसे लगभग 432 करोड़ साल तक रहना पड़ता है और घोर यातनाओं का सामना करना पड़ता है।
गरुड़ पुराण के अनुसार नर्क में दी जाने वाली यातनाएं
जब कोई महापापी मनुष्य की मृत्यु होती है तो उसे यम के दूत लेने आते हैं जिन्हे इस्लाम में अज़राईल भी कहा जाता है। ये यमदूत जीव को हण्टरों और मुग्धरों से मार मार कर यमलोक ले जाते हैं। ग्रंथों के अनुसार १०० बिच्छुओं के एक ही जगह पर काटने पर जितनी पीड़ा होती है उतनी ही पीड़ा इन हण्टरों की एक मार से होती है।
नर्क में प्रवेश करते ही वहां के दृश्य को देख कर जीव भय से कांपने लगता है और ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगता है क्योंकि वहां हर वक़्त हाहाकार मची रहती है।
जीव की चीक पुकार सुन कर नर्क के द्वारपाल सामने आते हैं जिनका नाम गरुड़ पुराण में धर्मध्वज बताया गया है। धर्मध्वज उस जीव की पूरी जानकारी चित्रगुप्त से लेते हैं और नर्क के द्वार खोल देते हैं।
चित्रगुप्त ईश्वर के वे दूत होते हैं जो सदैव जीव के साथ रहते हैं। स्थूल संसार में भी और सूक्षम संसार में भी। वे जीव के सभी अच्छे बुरे कर्मो का लेखा जोखा देखते हैं। चाहे वे कर्म मन से ही क्यों न किये गए हो। यमलोक में दाखिल होने के बाद वे जीव के सभी कर्मों को धर्मराज जी के सन्मुख रखते हैं।
गरुड़ पुराण के अनुसार जीव के सभी कर्मो को देखने के बाद धर्मराज जी सजा सुनाते हैं। फिर यमदूत उस जीव को बांध कर सजा देने के लिए नियत नर्क में ले जाते हैं।
शाल्मली : नर्क का एक भयंकर वृक्ष
नर्क में सबसे पहले उस जीव को एक ऐसे स्थान पर ले जाया जाता है जहाँ एक बहुत विशाल वृक्ष है जिसका नाम गरुड़ पुराण के अनुसार शाल्मली बताया गया है। यह जलती हुई अग्नि से युक्त एक बड़ा भरी वृक्ष है। जसकी अग्नि कभी शांत नहीं होती। जिसका आकार 5 योजन चौड़ा (40-50 मील) और 1 योजन (10 मील) ऊँचा है। जिसके पत्ते तलवार की तरह तेज़ धार वाले होते हैं।
पापी जीव को इस वृक्ष के तने से लोहे की जंजीरों से बांध दिया जाता है और यमदूतों द्वारा हण्टरों और मुग्धरों से मारा जाता है। वृक्ष की अग्नि से जलते हुए वह रोते हैं और चिल्लाते हैं परन्तु उनकी सहायता के लिए वह कोई नहीं आता। जब मार खा कर वे बेहाल हो जाते हैं तो यमदूत उन्हें शाल्मली से उल्टा लटका देते हैं। फिर बड़े बड़े लोहे के हण्टरों से मारते हैं। वे पापी इन दूतों के आगे हाथ जोड़ कर पुकार करते हैं के हमें शमा करें। परन्तु वे दूत बार बार उन्हें लोहे की लाठियों, मुग्धरों, तोमर, गदा और मूसलों से मरते हैं।
इस मार से जीव मूर्छित और बेजान हो जाता है। जब वे जागृत होते हैं तो यमदूत फिर से निर्दयता से मारते हैं। मारने से वे प्राणी नीचे गिर जाते हैं। नीचे गिरते समय तलवार की धार जैसे पत्तों से उनके शरीर कट जाते हैं। नीचे गिरते ही मॉस खाने वाले भूखे कुत्ते उन्हें नोच नोच कर खाते हैं। अत्यंत पीड़ा से वे रोते हैं और चिल्लाते हैं। इस चिल्लाने से जैसे ही उनके मुख खुलते हैं, दूत उनके मुख गर्म बालू से भर देते हैं और लोह के मुग्धरों से मरते हैं।
गरुड़ पुराण में वर्णन अन्य यातनाएं
गरुड़ पुराण के अनुसार इन नरकों के दृश्य इतने भयावह होते हैं कि जो भी प्राणी इसे देखता या सुनता है, वह भय से कांपने लगता है। कहीं कहीं पापियों को लकड़ी के आरे से चीरा जाता है तो को कोई कुल्हाड़ी से काटा जाता है। किसी किसी को गड्ढे में आधा गाढ़ कर उसके माथे को बाणों से बींधते हैं। किसी को कोहलू की तरह पीसते हैं। किसी को घी और तेल के कड़ाहों में डाल कर तला जाता है। किसी को कीड़ों के भरे कुंड में डुबाया जाता है। कहीं पर जीव को तीर के समान चोंच वाले बड़े बड़े कौओं और गिद्धों द्वारा नोचा जाता है।
इन नरकों की यातनाओं से जीव बहुत दुखी होता है बार बार अपने कर्मो को याद करता है और आगे से पाप न करने के लिए प्रार्थना करता है।