पिछले लेख में आपने पढ़ा था कि एक साधु अपने 360 शिष्यों के साथ देवी हिंगलाज के दर्शनों को जा रहा था। उसने रास्ते में बाबा श्री चंद जी को ध्यान मग्न देखा और उनकी तरफ आकर्षित हो गया। उस सन्यासी ने बाबा श्री चंद जी की परीक्षा लेनी चाही और मन में यह विचार किया कि “देखते हैं कि यह पूर्ण महात्मा है या कोई ढोंगी।”

भगवान श्री चंद जी महाराज तो अंतर्यामी थे। उन्होंने इस सन्यासी के विचार पढ़ लिए और अपनी शक्ति द्वारा 360 साधुओं को उनकी मनपसंद का भोजन करवाया।
साधु यह देखकर हैरान रह गया कि महाराज जी के पास तो भोजन की सामग्री ही नहीं थी और ना ही कोई बनाने वाला था। यह देखकर वह साधु भगवान श्री चंद्र जी के चरणों पर गिर पड़ा था और आशीर्वाद लेकर देवी हिंगलाज के दर्शनों को चल पड़ा था।
पारस पत्थर
सन्यासी और उसके शिष्य अभी कुछ दूर ही गए थे कि उस साधु के कदम एकदम रुक गए। इसका कारण यह था कि उस साधु के पास एक पारस पत्थर का टुकड़ा था। जब भी अपने शिष्यों को भोजन करवाना होता तो वह उस पारस पत्थर से छोटे से लोहे के टुकड़े को छू लेता और सोना बनाकर नगर में बेच देता। बदले में रसद और सामग्री लेता। जिससे वह 360 साधु भोजन करते।
सन्यासी ने जब देखा कि उसका पारस पत्थर उसके पास नहीं है तो उसके तो जैसे प्राण ही निकल गए। उसने सोचा कि जरूर भगवान श्री चंद के पास कहीं रह गया होगा। वह बाबा श्री चंद जी के पास वापस गया।

बाबा जी ने देखा के सन्यासी का चेहरा बिल्कुल पीला पड़ चुका था। आंखों के आगे अंधेरा छा रहा था और वह टांगों पर खड़ा भी नहीं हो पा रहा था। महाराज जी ने इस तरह सन्यासी को देखा तो उनसे पूछा कि “भगत जी क्या बात है। आप अभी तो गए थे और वापस भी आ गए। कोई विशेष कारन है।”
आप बहुत घबराये हुए भी लग रहे हैं। जो भी बात है खुलकर बताइए। परंतु वे सन्यासी अपने शिष्यों के साथ आया था। वह उनके सामनेअपनी व्यथा प्रकट नहीं करना चाहता था। भगवान श्री चंद तो अंतर्यामी थे। वह सब कुछ जानते थे। दो-तीन बार पूछने पर वह साधु, बाबा श्री चंद जी के चरणों पर गिर पड़ा और जोर-जोर से रोने लगा।
बाबा जी ने कहा कि “ऐसी क्या बात हो गई है जो आप इतना ज्यादा वैराग में हैं।”
सन्यासी ने भगवान जी से कहा कि “आप तो अंतर्यामी हैं। मैं क्या कहूं, मैं एक संन्यासी हूं। मेरे 360 शिष्य हैं, मेरा यह फर्ज बनता है कि मैं उनके भोजन और रहने की व्यवस्था करूं। इसलिए मेरे पास एक पारस का टुकड़ा था जिसे मैं इन साधुओं को भोजन कराया करता था। वह कहीं पर खो गया है। शायद आपके पास ही कहीं पर रह गया होगा। कृपया कीजिए, मुझे वह पारस बख्श दीजिए। मैं आपका बहुत आभारी रहूंगा।”
परमात्मा पर भरोसा
बाबा श्री चंद बोले कि “बस इतनी सी बात, पत्थर के छोटे से टुकड़े ने आपके मन की अवस्था को बदल दिया है। ईश्वर पर इतना भरोसा होना चाहिए कि वह सब को रिज़क देता है तो तुम्हें और तुम्हारे शिष्यों को क्यों नहीं दे सकता। वह सिरजनहार है सबको रिज़क देता है। वह तो इतना महा दयालु है कि पत्थर के अंदर जो कीड़े रहते हैं उन तक भी भोजन पहुंचना है। तो फिर तुम्हें क्यों नहीं देगा।”
बाबा श्री चंद जी ने कहा कि “एक लाल पत्थर का टुकड़ा यहां पर रखा तो था। परंतु हमने दरिया में फेंक दिया है।”
यह बात सुनकर साधु का रंग उड़ गया। बाबा जी ने कहा “उस दरिया में जाओ और अपना पत्थर पहचान कर ले लो।”
अरबों- खरबों पारस
साधु एकदम उठा और जल्दी-जल्दी दरिया की ओर चल पड़ा। जैसे ही दरिया के जल में उसने देखा तो हैरान रह गया कि वहां तो अरबों- खरबों पारस के पत्थर पड़े हुए थे।
भगवान जी ने कहा कि “भगत जी, जो तुम्हारा पारस है, उसे उठा लीजिए। इस घटना को देखकर साधु के होश गुम हो गए। मन में जो अहंकार था सब चूर-चूर हो गया।
हाथ जोड़कर अर्ज करने लगा की “है शिव स्वरुप, मुझे बक्श लीजिए और मुझे अपना पारस पहचानने में मदद कीजिए।”
बाबा श्री चंद जी ने कहा की “ठीक है जो भी पारस तुम उठाओगे, वह तुम्हारा ही होगा।”
श्री चंद जी की बात मानकर उसने एक पारस का पत्थर उठाया जो उसी का था। उसने यह लीला देखकर महाराज के चरण पकड़ लिए और विनती करने लगा कि “मुझे माफ़ कीजिये और मुझे आशीर्वाद दीजिए कि मैं इस माया के जंजाल से ऊपर उठ सकूं और उस परम पिता परमेश्वर को जान सकूँ।”
पारस पत्थर मिलने के बाद साधु-संन्यासी ने बाबा जी का धन्यवाद किया और माता हिंगलाज जी के दर्शन को जाने के लिए आज्ञा मांगी।
साधु-सन्यासी जी को देवी हिंगलाज जी के अध्भुत तरीके से दर्शन
साधु-सन्यासी के मन में माता हिंगलाज जी के दर्शनों की प्यास को देखकर बाबा श्री चंद जी महाराज बहुत प्रसन्न हुए और कहा कि “सन्यासी जी अगर आप चाहे तो माता हिंगलाज जी के यहीं पर दर्शन करवा देते हैं। अगर आपके दिल में सच्ची भक्ति और लालसा है तो बोलिए।”

इस तरह के वचन सुनकर साधु सन्यासी कहने लगे की “महाराज माता हिंगलाज जी के दर्शन यहीं पर हो सकते हैं? इस बात परआश्चर्य हो रहा है और यकीन करना थोड़ा मुश्किल हो रहा है। पर महाराज अगर आप देवी हिंगलाज जी के दर्शन करवा देते हैं तो मैं आपका आभारी हो जाऊंगा।
आपका सेवक बन जाऊंगा और आपके दर का भिखारी हो जाऊंगा। मैं अपना सन्यासी मत त्याग कर आपका उदासी मत अपना लूंगा। हे गुरु नानक पुत्र, मेरा माता के दर्शनों के लिए मन बहुत व्याकुल है। दया करो, परोपकार करो, मुझे माता हिंगलाज के दर्शन करवाओ।”
बाबा श्री चंद जी मुस्कुरा कर बोले “भगत जी दर्शन तो मैं आपको करवा दूंगा। परंतु आप माता जी को पहचान तो लोगे ना ?
साधु संन्यासी ने कहा के “क्यों नहीं पहचान पाऊंगा। माता की सूरत तो मेरे नैनों में बसी हुई है। वह तो मेरे रोम रोम में समाई हुई है। बाबा श्री चंद जी साधु सन्यासी के इस सच्चे प्रेम को देखकर बहुत खुश हुए।
बाबा कहने लगे “बोलो सन्यासी जी माता जी को प्रत्यक्ष तुम्हारे सामने लेकर आ जाएं”
“जी महाराज, अब तो दर्शनों की प्यास बहुत बढ़ चुकी है। कृपया कीजिए”
बाबा श्री चंद जी के पास ही एक वृद्ध स्त्री सेवा कर रही थी। बाबा जी ने कहा कि “अपने भगत को अपना असली स्वरूप दिखाकर निहाल करो।”
वृद्ध स्त्री
श्री चंद जी के इतने कहने की देर थी के उस वृद्ध स्त्री ने अष्टभुजा माता हिंगलाज जी का रूप धारण कर लिया और अपने भगत साधु सन्यासी को दर्शन दिए।

साधु सन्यासी की हैरानी की कोई हद न रही। कितनी ही देर तक वह माता के दर्शन करता रहा। मोहित होकर देखता रहा। दर्शन करने के बाद वह बाबा श्री चंद जी के चरणों में बारंबार नमस्कार करने लगा और क्षमा मांगने लगा कि मैं आपको पहचान नहीं पाया। मुझे क्षमा कीजिए।
भगवान मुझे नहीं मालूम था कि माता हिंगलाज आपके पास ही बसती हैं। आप ऋद्धि और सिद्धि के भंडार हैं। मुझे अपना शिष्य स्वीकार कीजिए।
भगवान श्री चंद जी महाराज साधु को प्रेम में इस तरह देखकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने साधु को ओम-सोहम का मंत्र दिया और अपना शिष्य बना लिया। भगत-भगवान की महान पदवी दी। कहा जाता है कि उस साधु सन्यासी ने अपना मत त्याग कर भगवान श्री चंद जी महाराज का उदासी मत ग्रहण कर लिया और धर्म प्रचार के लिए 360 साधुओं कोअलग-अलग जगह पर पूर्व में स्थापित किया।