मैं नहीं जानता कि आप मरनोप्रांत के जीवन में विश्वास रखते हैं या नहीं । लेकिन मेरी आधी ज़िंदगी धार्मिक ग्रन्थ और किताबें पड़ने में गुजरी है, इसलिए मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ कि इस जीवन से परे भी एक जीवन है।
जब भी किसी की मृत्यु हो जाती थी तो मैं हमेशा ये देखता था कि गरुड़ पुराण सुनाया जाता था। लेकिन कभी ध्यान ही नहीं गया कि इसमें ऐसा क्या लिखा है।
अब जा के इतने सालों के बाद जब इसका अध्यन किया तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ।
इसके बाद कुछ अंग्रेजी के लेखकों की किताबे भी पड़ीं जिन्होंने पास्ट लाइफ रिग्रेशन (Past Life Regression Therapy) के बारे में बताया। जिसमें सम्मोहन के द्वारा पिछले जन्मो के कर्मो को देखा जाता है।
गरुड़ पुराण एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमें मौत के बाद के सफर की जानकारी है। ये पूरा ग्रन्थ एक वार्तालाप के रूप में है, श्री विष्णु जी और उनके वाहन गरुड़ जी के बीच।
इस लेख में हम गरुड़ पुराण के उस हिस्से के बारे में ही बात करेंगे जिसमें मौत से लेकर यमलोक तक का सफर है।
गरुड़ जी द्वारा पहले प्रशन के उत्तर में विष्णु जी ने इस तरह व्याख्यान किया :
गरुड़ पुराण के अनुसार ऐसे पाप जो हमें नरक की तरफ़ ले जाते हैं
गरुड़ पुराण में विष्णु जी कहते हैं कि यममार्ग इतना भयानक् है कि इसके बारे में अगर कोई कानों से सुनता है तो भय से काँप जाता है। जो मनुष्य हर वक़्त पाप में लुप्त रहतें हैं, लालची होते हैं, बुरी संगत में रहते हैं, दूसरों को गुलाम समझते हैं, जिनके हृदय में प्रेम और दया भाव नहीं है, जो हर समय काम वासना में लुप्त रहते हैं, ऐसे मनुष्य अपवित्र नर्क में गिरते हैं और अनंत वर्षों तक दुख भोगते है।
दिव्य द्रिष्टी
विष्णु जी कहते हैं कि मनुष्य के मरने के ठीक पहले उसे दिव्य द्रिष्टि प्राप्त हो जाती है। वह सारे संसार को एक समान देखता है। वह अपने सभी जन्मो के किये हुए कर्मो को देख सकता है। लेकिन ईश्वर के नियम के अनुसार वह बोलने में असमर्थ हो जाता है।
गरुड़ पुराण के अनुसार उसी समय यमदूत आते है और उसके सूक्षम शरीर को उसके स्थूल शरीर से अलग करते हैं। जिसे हम मरना कहते हैं।

गरुड़ पुराण के अनुसार यमदूत दिखते कैसे हैं
कहते हैं कि यमदूत इतने भयानक होते हैं कि इंसान उन्हें देखते ही ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगता है। डर से वह मल मूत्र त्याग करता है। उनके हाथ में जो हंटर होते है, उनकी एक मार में इतना दर्द होता है जितना १०० बिच्छुओं के एक ही जगह काटने पर होता है। उस समय मनुष्य को एक एक पल युगों के समान लगता है। यम के दूत उसके गले में रस्सी डालते हैं और यमलोक की तरफ़ ऐसे ले जाते है जैसे एक अपराधी को राजा के सामने पेश किया जाता है।
यममार्ग में दी जाने वाली यातनायें
यममार्ग में यमदूतों द्वारा जीव को बताया जाता है कि किस तरह से नर्क में यातनाएँ दी जाती हैं। जिसे सुन कर वह बहुत दुखी होता है और अपने पापों को याद करता है। यममार्ग में दी जाने वाली सजाओं का वर्णन इस प्रकार है :
- जगह जगह पर उसे भूखे भेड़ियों के आगे फेंका जाता है।
- उसे भूखा और प्यासा रखा जाता है।
- १२ सूरजों की गर्मी में उसे तपती रेत पे दौड़ाया जाता है।
- जब वह चलने में असमर्थ हो जाता है तो उसे हंटरों से पीटा जाता है और घसीटा जाता है।
यमलोक में पहुंचते ही सबसे पहले जीव आत्मा को नरक में दी जाने वाली भयानक यातनाओं के दर्शन कराये जाते हैं। जिसके दर्शन मात्र से ही वह भय से कांप जाता है। यमराज जी की आज्ञा से दुबारा जीव को मात लोक में भेजा जाता है। जहां वो अपनी ही मृत्यु में आये हुए परिजनों के विरलाप देखता है। अपने स्थूल शरीर में प्रवेश करने की कोशिश करता है। लेकिन यमदूतों द्वारा बंधा होने के कारण वह असमर्थ हो जाता है।
गरुड़ पुराण के अनुसार भोजन दान का महत्व
जब जीव भूख और प्यास से व्याकुल हो जाता है तो उसे वही भोजन मिलता है जो उसके परिजनों द्वारा दान में दिया जाता है। परन्तु फिर भी वह संतुष्ठ नहीं हो पाता।
हिन्दू धर्म में मृत्यु के पश्चात् १०-१५ दिन तक भोजन अर्पण करने की मर्यादा है। जिसमें से २ भाग पंचतत्वों को अर्पण हो जाते हैं। एक भाग यमदूतों को और एक भाग जीव को प्राप्त होता है।
कुछ समय पश्चात् यमदूत जीव को फिर से वानर की तरह बांधकर ले जाते है।
गरुड़ पुराण के अनुसार यमलोक की दूरी
विष्णु जी कहते हैं कि यमलोक की कुल दूरी ८६ हज़ार योजन है। एक योजन में १० मील होते हैं। जीव आत्मा को हर दिन २४७ योजन सफर तह करना होता है। सफर के अन्तिम पड़ाव में १६ नगर आते है जिनको पार करके जीव यमलोक में दाखिल होता है।
उन १६ नगरों के नाम इस प्रकार हैं :
सौम्यपुर, सौरिपुर, नगेन्द्र भवन, गन्धर्व, शैलगम, क्रौंच, क्रूरपुर, विचित्र भवन, ब्रह्मपद, दुःखद, नानाक्रन्दपुर, सुतप्त भवन, रौद्र नगर, पयोवर्षण, शीतढ्यः, बहुभीति।
इसके आगे यमलोक है। यमदूतों द्वारा बंधा हुआ वह पापी जीव मार्ग में रोता हुआ जाता है।
सूक्षम भयानक वन
यमलोक के रास्ते में एक भयानक वन का वर्णन है जिसका क्षेत्रफल लगभग २००० योजन का है। वह वन गिद्दों, मधुमखियों, उल्लुओं से भरा हुआ है। उस वन के चारों ओर अग्नि जलती रहती है। इस वन के सभी वृक्ष और झाड़ियां के पत्ते तलवार के समान तीखे होते है।
पापी जीव को इस वन को पार करना होता है। वन की अग्नि से जीव जब परेशान होता है तो वृक्षों के नीचे जाता है। जहां उसे मधुमखियां डंक मारती हैं। जिनसे बचने के लिए वह झाड़ियों में छिप जाता है। जिनके पत्ते तलवार के समान तीखे होते हैं जिस्से उसका शरीर कट जाता है। जिस कारण जीव को अत्यंत पीड़ा का सामना करना पड़ता है
इसके अलावा मार्ग में और भी कठिनाईयों का सामना होता है जैसे कि अग्नि वर्षा, पत्थरों की वर्षा, रक्त की वर्षा, गर्म जल की वर्षा। कहीं कहीं पर तो मल्ल और मवाद के कुंडों को लांग कर जाना पड़ता है। जिस्से जीव को बहुत दुःख का अनुभव होता है।
वैतरणी नदी
गरुड़ पुराण के अनुसार यमार्ग में एक बहुत ही भयावह नदी का वर्णन है जिसे वैतरणी के नाम से जाना जाता है। इस नदी का जिक्र अनेक ग्रंथो में आया है। गरुड़ पुराण के अलावा गुरु ग्रन्थ साहिब में भी इसका वर्णन मिलता है।
वैतरणी १०० योजन चौड़ी है जिसमें मवाद, रक्त, कीचड़ और मास भरा पड़ा है। जो बहुत ही गहरी है और जिसे पार करना बहुत ही कठिन है। जो मास खाने वाले घड़ियालों और ख़तरनाक जीवों का घर है। इसके दर्शन मात्र से ही पापी रूह कांपने लगती है। यमदूतों द्वारा जीव को इसमें घसीट कर फेंका जाता है। उसे रक्त और मवाद का सेवन करना पड़ता है। इस नदी में छोड़ा गया जीव बहुत दुखी होता है। उसमे गिरे हुए जीव की रक्षा के लिए कोई नहीं आता।
विष्णु जी कहते हैं कि पापी जीवों के पतन के लिए ही इस नदी का निर्माण किया गया है।
इस प्रकार अनेक दुखों को भोगता हुआ, रोता चिल्लाता हुआ प्राणी यमलोक में पहुंचाया जाता है। गरुड़ पुराण में जहा भयानक यातनाओं वर्णन है वही जीव आत्मा के दुखों से निवारण के लिए उपाए भी बताये गए हैं।
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