प्रेत उद्धार की एक सच्ची घटना : एक आध्यात्मिक दृष्टिकोण-२

परमात्मा द्वारा बनाया गया यह संसार बहुत रहस्यमय है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार 84 लाख योनियां हैं जिसमे भूत प्रेत पिशाच अदि भी शामिल हैं। हर इंसान अपने-अपने कर्मो के अनुसार सुख और दुःख भोगता है। गरुड़ पुराण के अनुसार अनेक प्रकार के नर्क और स्वर्ग होते हैं जिनमे मरणोपरांत ले जाया जाता है।

प्रेत योनि क्यों प्राप्त होती है

गुरु ग्रंथ साहिब जी में बहुत ही प्यारी पंक्तियाँ हैं। जिनके अनुसार यह कहा गया है कि जो प्राणी मरते समय जैसा चिंतन करता है उसे वैसी ही गति प्राप्त होती है।

शब्द

१) पहली पंक्ति में कहा गया है कि अंत समय जो धन का चिंतन करते हुए मरता है वह सर्प की योनि में अवतार लेता है। इसलिए यह अक्सर देखा गया है कि जहां खज़ाना रखा जाता है वहां सांपों का पाया जाना स्वाभाविक है।

२) दूसरी पंक्ति में कहा गया है कि जो प्राणी अंत समय में स्त्री या स्त्री भोग की चिंता में मर जाते हैं वह वेश्वा की योनि में अवतार लेते हैं।

३) तीसरी पंक्ति यह कहती है कि अंत समय जो अपने बच्चों का चिंतन करता है वह सूअर की योनि में अवतार लेता है।

४) अगली पंक्ति यह कहती है कि जो अंत समय अपने मकान या घर की ईमारत का चिंतन करता है वह प्रेत योनि में जाता है।

५) आखिरी पंक्ति में गुरु जी ने कहा है कि जो अंत समय नारायण का चिंतन करता है वह बैकुंठ धाम को प्राप्त होता है और इस जन्म-मरण के खेल से मुक्त हो जाता है

इस लेख में एक ऐसी ही सच्ची घटना के बारे में बात करेंगे जो यह पंक्तियों को सही सिद्ध करेगी। यह घटना एक संत द्वारा एक प्रेत के उद्धार की है। जो अपने मकान के मोह में मरने के बाद उसी मकान में प्रेत योनि को प्राप्त हुआ और अनेक वर्षो तक दुःख भोगता रहा। यह कहानी एक तप्पसवी के द्वारा बताई जा रही है:

संगत यात्रा

मेरे सभी साथी और संगत ने यह फैसला किया कि सभी गुरुद्वारों की यात्रा की जाये। इस संकल्प के साथ हम संगत के साथ श्री हजूर साहब, नांदेड़ की यात्रा पर निकल पड़े । यह फैसला किया गया कि जिन रास्तों से गुरु गोविंद सिंह जी गए थे, उन्हीं रास्तों से चला जाए और रास्ते में सभी ऐतिहासिक गुरुद्वारों के दर्शन करते हुए जाएं।

यात्रा के दौरान हम एक पुराने कस्बे से गुजर रहे थे। संध्या का वक़्त भी हो गया था। संगत ने फैसला किया कि इसी पुराने कस्बे में रात गुजारी जाए। कस्बे के लोग थोड़े नास्तिक स्वभाव के थे, जो हर आए गए राहगीर को एक पुराने मकान में ठहराया करते थे। जिसमें यह अफवाह उड़ी हुई थी कि उसमें भूत प्रेत का वास है। हमारे साथ भी ऐसा ही किया गया।

मकान बहुत ही अच्छा, ईंटों से बना हुआ था। बहुत सारे रिहाइशी कमरे थे लेकिन वह बहुत ही गंदा और पुराना था।

हमारे साथ संगत में कुल 30-35 लोग थे। सभी ने मकान को साफ किया और एक कमरे में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का निवास किया। संध्या का पूजा पाठ इस कमरे में किया गया और उसके पश्चात कीर्तन और भजन भी उसी कमरे में हुआ। संत जी ने जमीन पर ही गुरु ग्रंथ साहिब जी के पास अपना आसन जमा लिया। सभी लोग अपने-अपने कमरे में जाकर विराजमान हो गए।

संत जी, जो ईश्वर के नाम में हमेशा लीन रहते थे। वह गुरु ग्रंथ साहिब जी वाले कमरे में अकेले ही सो गए। क्योंकि सर्दियों के दिन थे तो उन्होंने अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया और प्रभु नाम के ध्यान में बैठ गए।

प्रेत आगमन

संत जी अपने ध्यान में बैठे हुए थे कि तभी दरवाजे पर खटखटाहट हुई। उन्होंने उठकर दरवाजा खोला तो देखा कि सामने एक बहुत ही विकराल रूप वाला भयानक इंसान खड़ा था और जो कांप रहा था।

संत जी ने उसको ऊपर से नीचे तक देखा। परन्तु मन में बिल्कुल भी खौफ पैदा नहीं हुआ और उससे पूछा कि “कौन है तू”।

प्रेत ने उत्तर दिया कि “मैं इस मकान का मालिक हूं। सदियां हो चुकी हैं, मैं मर कर इस मकान में ही एक प्रेत बनकर रह रहा हूं। जो भी यहां आता है मैं उसका रक्त पी लेता हूं और उसे जान से मार देता हूं। लेकिन मेरी प्यास और मेरी भूख फिर भी संतुष्ट नहीं होती। मुझे संतोष नहीं प्राप्त होता। बहुत दुख में हूं और इस चार दिवारी में कैद होकर रह गया हूं।”

आज जब मैंने देखा कि आप संगत रूप में गुरु ग्रंथ साहिब जी के साथ इस मकान में आए हैं। तो मुझे एक उम्मीद की किरण दिखाई दी है। इसलिए मैं आपके सम्मुख आया हूं कि मेरा इस प्रेत योनि से छुटकारा दिला दीजिए मैं आपका बहुत आभारी रहूंगा।

मेरी कल्याण कीजिए मैं यह आपसे प्रार्थना करता हूं। इस प्रेत योनि से मुझे छुटकारा दिला दीजिए। कलयुग में और कोई साधन नहीं है जो मुझे इस प्रेत योनि से छुटकारा दिला पाए। सो मैं आपसे दया की भीख मांगता हूं कि मेरी इस प्रार्थना को स्वीकार किया जाए और इस मकान में मेरे लिए गुरु ग्रंथ साहिब जी का पाठ किया जाए और यज्ञ भी किया जाए। उसके बाद ही मेरा इस प्रेत योनि से कल्याण मुमकिन है।

गुरु के सिख बहुत ही दयावान थे। प्रेत की हालत पर उन्हें बहुत दया आयी और करुणा में आकर उन्होंने कहा कि “तेरी हालत पर हमें बहुत दया आती है और हम तेरा भला करने के लिए यह प्रार्थना स्वीकार भी करते हैं। लेकिन हमारे पास एक परेशानी है कि हमारे पास धन की कमी है और तुम्हारे अनुसार अगर यज्ञ भी रचा जाए तो उसके लिए भी हमारे पास धन संपूर्ण नहीं है।

यह सुनकर प्रेत आत्मा ने उत्तर दिया कि “मुझे पहले से ही ज्ञात था कि आप लोगों के पास धन पर्याप्त नहीं है। मेरे इस मकान में बहुत धन है। इस कमरे के कोने में ₹500 एक मिटटी के बर्तन में बंद है। कृपया आप वहां से खोद कर निकाल लें और सुबह गुरु ग्रंथ साहिब का संपूर्ण अखंड पाठ करने के बाद मेरी कल्याण के लिए प्रार्थना कीजिए। मैं आपके गुरु की दुहाई देकर आप लोगों से प्रार्थना करता हूं कि मेरी कल्याण कीजिए।”

संत जी ने उत्तर दिया कि “ठीक है ऐसा ही होगा परन्तु हमें यह कैसे ज्ञात होगा कि तुम्हारा कल्याण हुआ है कि नहीं।”

उत्तर में उस प्रेत आत्मा ने कहा कि “अखंड पाठ सम्पूर्ण होने के पश्चात् सभी लोगो में लंगर लगाया जाये। घर के भीतर एक छोटा सा कमरा है। पाठ सम्पूर्ण होने के बाद कड़ाह प्रशाद एक बर्तन में डाल कर वहां रख दिया जाये। सारी संगत के भोजन समाप्त करने के बाद अगर कड़ाह प्रशाद वहां न हुआ तो समझ लीजिए कि मेरी कल्याण हो चुकी है बस इतना कहते ही वह प्रेत आत्मा चली गयी।

प्रेत उद्धार की प्रिक्रिया

प्रेत

प्रेत ने जहाँ बताया था वहां खोदकर ₹500 निकाल लिए गए और अखंड पाठ और यज्ञ की सारी सामग्री खरीदी गयी। कस्बे में यह बात फैला दी गई कि उस प्रेत के नामित मकान में अखंड पाठ होने जा रहा है। सभी नगर वासियों को आने का निमंत्रण है।

कस्बे के लोग इस बात पर हैरान थे कि इस मकान में तो कोई दो पल भी नहीं ठहर सकता था लेकिन यह सिखों ने तो पूजा पाठ आरम्भ कर दिया है। यह एक आचार्य खेल था।

दिन के प्रारम्भ होते ही पूर्ण मर्यादा के साथ अखंड पाठ शुरू किया गया। सभी सेवादारों ने स्वछता का ध्यान रखते हुए गुरु ग्रन्थ साहिब का सम्पूर्ण पाठ 3 दिन में समाप्त किया। सम्पूर्णता पर प्रेत के उद्धार के लिए प्रार्थना की गयी।

यज्ञ भी मर्यादा के साथ संपन्न हुआ। प्रेत के कहने के अनुसार कड़ाह प्रशाद उस छोटे कमरे में रखा गया। सभी नगर वासियों को गुरु का लंगर दिया गया। फिर संत जी ने उस कमरे में दाखिल होकर देखा कि प्रसाद वहां है या नहीं। लेकिन जैसे ही उन्होंने दरवाज़ा खोला तो क्या देखा कि प्रसाद वहां वैसे ही रखा हुआ था। इसका अर्थ यह था कि प्रेत की अभी कल्याण नहीं हुई है। जरूर कुछ रुकावट पड़ गई है या किसी से कोई गलती हो गई है।

इसे देखने के बाद यह फैसला किया गया कि एक रात इस जगह पर और ठहरा जाए क्योंकि संत जी को यकीन था कि आज रात प्रेत फिर से आएगा और कल्याण ना होने का कारण बताएगा।

रात हुई तो संत जी का दरवाजा फिर से खटखटाया गया। जैसे ही उन्होंने दरवाजा खोला तो सामने उसी प्रीत को देखा, लेकिन अब उस प्रेत की हालत बेहतर हो गई थी। वह दिखने में अब अच्छा लग रहा था। संत जी ने उससे पूछा कि “तुम्हारी कल्याण क्यों नहीं हुई। क्या कारण है” तो प्रेत ने हाथ जोड़कर प्रार्थना के स्वरूप में कहा कि “आपको मेरे लिए एक अखंड पाठ और करना है। मुझे यकीन है कि मेरी कल्याण इस बार अवश्य होगी।

प्रेत उद्धार में विलम्भ

संत जी ने फिर से पूछा कि “क्या कारण है जिस वजह से तुम्हारी कल्याण नहीं हुई।” प्रीत में बड़े अदब के साथ उत्तर दिया कि ” आपके सेवादारों में से एक सेवादार ऐसा था जो रात को थोड़ी देर के लिए सो गया था लेकिन सोते समय उसका वीर्यपात हो गया था जिस कारण से वह अपवित्र हो गया था। परंतु इसके बारे में उस सेवादार को तनिक भी ज्ञान नहीं था। वह इसी हालत में जाकर गुरु ग्रंथ साहब से पाठ प्रारम्भ करने लग गया, जिस कारण से पूर्ण मर्यादा में विघ्न पढ़ गया और मेरी कल्याण होते-होते रह गई।

अब आपसे मेरी विनती है कि एक अखंड पाठ साहिब श्री गुरु ग्रंथ साहिब के ऊपर और किया जाए ताकि मेरी कल्याण हो सके उसके लिए जो धन आपको चाहिए उसी जगह खोद कर ले लीजिए और अखंड पाठ शुरू कीजिए। मुझे पूर्ण विश्वाश है कि अब पाठ संपूर्ण होने तक मेरी कल्याण जरूर हो जाएगी।

यह सब बताने के बाद प्रेत आत्मा वहां से चली गई और सेवादारों में इस बात की पुष्टि की गयी। उस सेवादार ने यह स्वीकार किया कि “हां मुझे ऐसी गलती हुई थी, लेकिन अनजाने में हुई है। मुझे इसके बारे में बाद में जानकारी हुई। जिसके लिए उसने सबके सामने शमा मांगी।

अगले दिन पुनः अखंड पाठ साहिब की तैयारी शुरू की गई। पूर्ण मर्यादा के साथ श्री अखंड पाठ साहिब का पाठ प्रारंभ किया गया। इस बार सेवादारों का खास ध्यान रखा गया और पूर्ण मर्यादा के साथ पाठ को संपूर्ण किया गया। पाठ संपूर्ण होने के बाद यज्ञ सम्पूर्ण किया गया।

उस कमरे में प्रेत की लिए पुनः प्रशाद रखा गया। लंगर प्रसाद पूरी संगत में दिया गया। कुछ समय पश्चात् संत जी ने उस छोटे कमरे में जाकर देखा तो पाया कि वहां प्रसाद का बर्तन खाली था। अर्थात प्रेत का उद्धार हो चुका था। वह बैकुंठ धाम की यात्रा पर निकल पड़ा था।

निष्कर्ष

यह सच्ची घटना दर्शाती है कि अंत समय जो अपने मकान का चिंतन करता है वह प्रेत योनि में अवश्य जाता है। अब प्रश्न उठता है कि अंतिम समय विचारों पर काबू कैसे हो। इसका उत्तर यह है कि पूरी ज़िन्दगी मनुष्य के जो विचार सबसे प्रबल होंगे अंतिम समय में भी वही विचार आएंगे। जो मनुष्य पूरी उम्र ईशवर प्रेम में गुज़ार देता है उसे अंतिम समय में भी वैसे ही विचार आएंगे। तथा जो मनुष्य तमाम उम्र माया के कार्यों में लिप्त रहा हो उसे अंतिम समय में भी वैसे ही विचार आएंगे।

Leave a Comment

Index