श्री चन्दर जी महाराज का रहस्यमय तरीके से जन-कल्याण

महाराणा प्रताप और श्री चन्दर जी महाराज

महाराणा प्रताप

श्री चन्दर जी महाराज दुनिया का कल्याण करते हुए सिंध, द्वारिका, सुदामा पुरी, गुजरात में पहुंचे। जो भी साधु आपको रास्ते में मिलता उसको सच का उपदेश देते के जन-कल्याण के लिए अपने जीवन को लगाना ही परोपकार है। इस तरह धर्म का प्रचार करते हुए आप राजस्थान पहुंचे।

यहां राजाओं का बुरा हाल देखकर श्री चन्दर जी महाराज के मन में दुख हुआ। जब महाराज ने महाराणा प्रताप के बारे में सुना कि वह जुल्म से खूब टक्कर ले रहा है और अपनी शान को बरकरार रखे हुए है, हिंदु धर्म की लाज रख रहा है। यह सुनकर आप बहुत प्रसन्न हुए और महाराणा प्रताप से मिलने का फैसला किया।

इन दिनों महाराणा प्रताप अकबर बादशाह से चित्तौड़गढ़ का किला छुड़वाने के लिए रणनीति बना रहा था और युद्ध के लिए तैयारी कर रहा था। वह थोड़ा परेशान भी था।

महाराणा प्रताप को भगवान श्री चन्दर जी महाराज ने सपने में दर्शन दिए। जब महाराणा सुबह उठा तो उसने सुना कि इलाके में कोई साधु आया है। जिसके कान में मांस के कुंडल है। इतना सुनते ही महाराणा को रात का सपना याद आ गया और उसने तुरंत महाराज जी के दर्शन करने का फैसला किया।

जब महाराणा प्रताप श्री चन्दर जी के पास पहुंचा तो दर्शन करके निहाल हो गया और विनती करने लगा कि “है धर्म रक्षक, मेरी सहायता कीजिए और मुझे आशीर्वाद दीजिए कि मैं चित्तौड़गढ़ का किला अकबर से हासिल कर सकूं। मुझे शक्ति दो ताकि मेरी जीत हो।

श्री चन्दर जी महाराज मुस्कुराने लगे और कहने लगे कि हार-जीत तो उस करतार के हाथ में है। धर्म से कुर्बान होने वाले, पक्के इरादे वाले और नेक इंसान के साथ ईश्वर हमेशा होते हैं। उसकी हर मनोकामना को पूरा करते हैं। यह बात सुनकर महाराणा ने भगवान श्री चन्दर जी महाराज को प्रणाम किया और आशीर्वाद लेकर चला गया।

कुछ समय पश्चात महाराणा प्रताप चित्तौड़गढ़ का किला हासिल करने में सफल हो गया। उसने भगवान श्री चन्दर जी महाराज का बहुत धन्यवाद किया।

हमको पागल कहने वाला खुद पागल है

सिंध के कुछ भगत-जन श्री चन्दर जी महाराज के पास आए और हाथ जोड़कर विनती करने लगे कि “हे सर्वशक्तिमान, गुरु नानक पुत्र हमारी रक्षा कीजिए। सिंध का नवाब मोहम्मद बाकी हिंदुओं को ज़बरदस्ती मुसलमान बना रहा है और अपनी राजधानी को मक्का शरीफ बनाना चाहता है।

मोहम्मद बाकी ने शंख, घड़ियाल, तिलक लगाना, हिंदुओं की पूजा पाठ पर पूर्ण रूप से पाबंदी लगा दी है। श्री चन्दर जी महाराज इन भक्तों की दर्द भरी कहानी सुनकर झट से सिंध पहुंच गए। वहां आकर उन्होंने मंदिर में सुबह-शाम शंख, घड़ियाल और आरती शुरू करवा दी।

यह खबर जब नवाब के पास पहुंची तो वह कहने लगा कि “आरती करने वाला, शंख बजाने वाला, कोई पागल ही होगा, अपने आप यहां से चला जाएगा। जब श्री चन्दर जी महाराज जी को यह बात बताई गई तो उनके मुखारविंद से स्वाभाविक यह निकल गया कि “हमको पागल कहने वाला खुद पागल है।”

इतनी बात कहते ही मोहम्मद बाकी नवाब अपने दरबार में बैठा-बैठा पागल हो गया और कुछ समय पश्चात अपनी ही तलवार से खुद ही मर गया।

यह चमत्कार जब नवाब के बेटे जान-बेग ने देखा तो उसको समझ में आ गया कि यह कोई ईश्वरी अवतार है। खुद चलकर गया और श्री चन्दर जी के चरणों पर गिर पड़ा। कहने लगा कि मैं कभी भी किसी हिंदू को तंग नहीं करूंगा और ना ही किसी पूजा पाठ पर पाबंदी लगाऊंगा।

श्री चन्दर जी ने उसको माफ किया और आशीर्वाद दिया कि वह राजगद्दी पर बैठे और सत्य का राज चलाये और धर्म की अगवाई में एक सच्चा मुसलमान बने।

जब माया एक सुन्दर स्त्री के रूप में आई

एक बार बाबा श्री चन्दर जी महाराज सुल्तानपुर में एक भक्त को उपदेश दे रहे थे कि “संसार हमेशा सुख चाहता है। परंतु माया का त्याग नहीं करता। इसलिए अगर तुम सुख चाहते हो तुम्हे इस माया के पदार्थों की तृष्णा से दूर रहना होगा। यह एक नागिन की तरह है। हरि का भजन ही सबसे उत्तम है। तुम उसका भजन किया करो।

उस भक्त ने कहा कि “महाराज यह माया नागिन दिखती कैसी है ? मुझे इसके दर्शन तो कराओ।” बाबा जी ने कहा के “ठीक है ब्रह्म मुहूर्त में नदी के किनारे आ जाना। हम वही मिलेंगे। माया के दर्शन करा देंगे।

वो भक्त श्री चन्दर जी के कहे अनुसार सुबह नदी के किनारे आ गया। बाबा श्री चन्दर जी निरंकार की याद में समधी स्तिथ बैठे थे। महाराज जी ने अपनी आंखे खोली और उस भक्त को अपने पास बिठा लिया। अभी कुछ ही समय बिता था के एक बहुत ही खूबसूरत स्त्री हुज़ूर के दर्शनों को आ पहुंची। उसने सात बार भगवान् श्री चन्दर जी की परिकर्मा की, चरणों पर दंडवत प्रणाम किया और बैठ गयी।

शिव अवतार भगवान् श्री चन्दर जी महाराज बोले ” कौन हो तुम ?”

जी “मैं माया हूँ। आपके दर्शनों के लिए आयी हूँ।” वह स्त्री बोली

“तुमने ये केसा स्वरुप बनाया है ? तुम्हारे मस्तक के बाल क्यों झड़ गए हैं। गर्दन के पीछे से भी बाल कम हैं। क्या कारन है?” बाबा जी ने पूछा।

माया ने कहा कि “आप तो ज्ञानी है। सब कुछ जानते हुए भी पूछ रहे हैं। फिर भी मैं आपको बताती हूं। आप जैसे फकीरों के आगे दंडवत और माथा टेक-टेक कर मेरी बाल झड़ गए हैं। क्योंकि आप जैसे संत महात्मा लोग मुझे प्रेम नहीं करते और मैं उनके दर की दासी बन कर उनके पीछे पीछे फिरती रहती हूँ। उनके चरणों में माथा रगड़ती रहती हूं ताकि मेरा भी कल्याण हो सके।

गर्दन के पास वाले बाल मेरे इसलिए कम हैं क्योंकि ग्रस्तियों ने खींच-खींच कर घटा दिए हैं। वह मुझे पकड़ना चाहते हैं परंतु मैं उनके हाथ नहीं आना चाहती। मेरी आपसे विनती है कि मेरी भी कल्याण कीजिए।”

पास बैठे भक्त ने जब यह देखा तो हैरान रह गया और श्री चन्दर जी के चरणों में गिर पड़ा । बार बार दंडवत प्रणाम करने लगा और उनका शिष्य बन गया।

एक साधु के साथ रहस्यमय घटना

सिंध के पास बाबा श्री चन्दर जी निरंकार की याद में समाधि स्थित बैठे हुए थे। उसी समय एक बिहार का साधु अपने साथ 360 शिष्य लेकर देवी हिंगलाज जी के दर्शन को जा रहा था। अचानक उसकी दृष्टि भगवान श्री चन्दर जी महाराज पर पड़ी। उसे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे ईश्वर स्वयं धरती पर आकर समाधि स्थित हो गए हो।

देवी हिंगलाज

श्री चन्दर जी महाराज का नूरानी चेहरा देखकर वह आगे ना बढ़ सका और वहीं रुक कर बाबा श्री चन्दर जी की ओर देखने लगा। वह महाराज जी की तरफ आकर्षित हो उठा और सोचने लगा कि ऐसे महान तपस्वी के दर्शन जरूर करने चाहिए। उस सन्यासी को बाबा जी के चेहरे में से भगवान शिव के दर्शन हुए।

साधु ने अपने शिष्यों के साथ बाबा जी को दंडवत प्रणाम किया और पास ही बैठ गया। उसके मन में यह ख्याल आ रहा था की देखते हैं यह साधु महात्मा कितने पहुंचे हुए हैं।

अभी ऐसी विचार उसके मन में चल ही रही थी की श्री चन्दर जी ने समाधि खोली और अपने तेजस्वी नेत्रों से साधु और उसके शिष्यों को देखने लगे। इस दृष्टि की आभा इतनी प्रबल थी कि वह साधु झेल ना सका और सर झुकाकर महाराज जी के चरणों पर गिर पड़ा।

बड़ी निम्रता से विनती करने लगा कि “महाराज इस सन्यासी पर भी कृपा कीजिए।” श्री चन्दर जी महाराज उसके दिल की बात जान गए और कहने लगे कि “सन्यासी जी इतनी भीड़ लेकर कहां को जा रहे हैं।”आगे से सन्यासी जी बोले कि “स्वामी जी देवी माता हिंगलाज जी के दर्शनों को जा रहे हैं।

श्री चन्दर जी मुस्कुराने लगे और कहने लगे कि “यह सारे साधु आपके साथ ही हैं?”

“जी हां महाराज यह सारे मेरे शिष्य हैं। हम सभी देवी हिंगलाज जी के दर्शनों को जा रहे हैं।”

महाराज जी उस सन्यासी के दिल की बात जान गए कि वह उनकी परीक्षा लेना चाहता है। महाराज जी ने कहा कि “ठीक है आप लोग चले जाना परंतु पहले हमारे यहां भोजन कर लीजिए।”

सन्यासी श्री चन्दर जी की बात सुनकर हैरान हो गया और विचार करने लगा कि एक साधु और उनका एक शिष्य मेरे 360 साधुओं को कैसे भोजन करवा सकता है। यहां पर तो कोई भोजन का प्रबंध भी नहीं है और ना ही कोई भजन बनाने वाला है। इतने सारे साधुओं का भोजन किस प्रकार तैयार होगा।

परंतु जल्दी ही उसकी यह शंका दूर हो गई। जब उसने बाबा श्री चन्दर जी जी की रहस्यमई लीला देखी।

बाबा श्री चन्दर जी नेअपने शिष्य कमलिया जी से कहा कि “इस छोटे बर्तन पर लाल कपड़ा रख दीजिए और हर साधु को उसकी मर्जी के मुताबिक जो वह भोजन करना चाहता है, इस बर्तन से निकाल कर परोस दीजिए।”

कमलिया जी हर साधु के पास गए और उससे उनका पसंदीदा भोजन पूछ कर उनकी पत्तल में रखते गए। यह सब देख कर सन्यासी जी आश्चर्य चकित हो गए। उसे अपनी भूल का एहसास हुआ और मन में बहुत गिलानी भी आयी के एक शिव स्वरुप साधु के विषय में ऐसा विचार आया।

360 साधुओं को भोजन

साधुओं ने बड़े प्रेम से और आनंद से तृप्त होकर भोजन किया। भोजन करने के बाद सन्यासी जी और उसके शिष्य श्री चन्दर जी महाराज जी के चरणों पर गिर पड़े और दंडवत प्रणाम करने लगे और आज्ञा पाकर माता हिंगलाज के स्थान की ओर चले गए।

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