शिव पुराण की कथा में अनेक ऐसी कहानियों का वर्णन है जिसे पढ़ कर हमें आध्यात्मिक मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। ऐसी सी एक कहानी चंचुला की है।
चंचुला
समुद्र के निकटवर्ती एक गांव था। जिसका नाम वाष्कल था। इस गांव के लोग दुष्ट प्रवृत्ति के मालिक थे। इनका किसी भी धार्मिक कार्य से कोई लेना-देना नहीं था। यह ना तो देवताओं पर विश्वास करते थे और ना ही भाग्य पर। यह लोग खेती करते थे। परंतु साथ में अस्त्र और शास्त्र भी रखते थे। धर्म और न्याय से इनका कुछ लेना-देना नहीं था। वह सदा ही भोगों में डूबे रहते थे। यहां की स्त्रियां भी कुटिल, दुष्ट, नीच विचार वाली थीं। यह एक गांव नहीं दुष्टों का निवास स्थान था।
चंचुला का दुष्ट पति बिन्दुग
इसी गांव में एक बिन्दुग नाम का ब्राह्मण रहता था। जो बड़ा ही दुराचारी और महापापी था। उसकी एक स्त्री थी जो बहुत ही सुंदर थी। जिसका नाम चंचुला था। वह सदा धर्म का पालन करती थी और कुकर्म के मार्ग से दूर रहती थी। परंतु इसका पति दुष्ट ब्राह्मण वेश्यगामी हो गया था। इसी तरह काफी समय बीत जाने पर पति के आचरण और संगति से प्रभावित होकर आगे चलकर वह स्त्री भी दुराचारिणी हो गई।
इसी दुराचार में इस पति-पत्नी का बहुत समय व्यतीत हो गया। एक दिन दुष्ट बुद्धि ब्राह्मण बिन्दुग समय अनुसार मृत्यु को प्राप्त हो गया और घोर नरकों में जा पड़ा। अनंत काल तक नरक भोगने के बाद वह दुष्ट पापी विंध्य पर्वत पर पिशाच की योनि में आ गया। उसकी पत्नी चंचुला बहुत समय अपने पुत्रों के साथ ही रही।
तीर्थ यात्रा
एक दिन सौभाग्य से किसी त्यौहार के आने पर वह स्त्री भाई बंधुयों के साथ किसी तीर्थ यात्रा पर गई। तीर्थ यात्रियों के साथ उसने वहां के जल में स्नान किया। वह तो घूमने-फिरने के विचार से मेला देखने की दृष्टि से गई थी। वहां एक दिन वह घूमती-फिरती किसी देव मंदिर में पहुंची। जहां एक ब्राह्मण देवता शिव पुराण की कथा कर रहे थे।
ब्राह्मण देवता कह रहे थे कि जो स्त्रियां पराये पुरुषों के साथ मलीन होती हैं। वह मरने के बाद यमलोक में जाती है। वहां यमराज के दूत उनको घोर नारको में ले जाते हैं। जहाँ गरुड़ पुराण के अनुसार बहुत भयानक यातनाएं दी जाती हैं। जो स्त्रियां पर-पुरुष का संग करती हैं। उनकी योनियों में तपे हुए लोहे का लावा डाला जाता है।
चंचुला को पापों का ज्ञान और पश्चाताप
ब्राह्मण देवता के मुख से यह कथा सुनकर चंचुला भय से कांपने लगी और व्याकुल हो उठी। जब कथा समाप्त हुई और सभी लोग वहां से चले गए। तब चंचुला एकांत में बैठे हुए ब्राह्मण देवता के पास गई और बोली के “हे ब्राह्मण देवता मैं अपने धर्म को नहीं जानती थी। इसलिए मेरे द्वारा बहुत दुराचार हुआ है। मैंने बहुत पाप किए हैं। मेरे ऊपर कृपा कीजिए और मेरा उद्धार कीजिए। आज आपके प्रवचनों को सुनकर मुझे बहुत ही भय लग रहा है। मुझे इस संसार से वैराग्य हो गया है। मुझ पापिन को धिक्कार है।
मैं निंदा के योग्य हूं। धर्म से विमुख हो गयी। न जाने कौन-कौन सी घोर यातनाओं को मुझे सहना पड़ेगा। मृत्यु काल में उन यम के दूतों का सामना कैसे हो पाएगा। जब वे बलपूर्वक मेरे गले में फंदे डालकर मुझे बांधकर यमलोक ले जाएंगे। तब मेरा क्या होगा। जब मेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े किए जाएंगे। उन भयंकर यातनाओं से मेरी कौन रक्षा करेगा। हे ब्राह्मण देवता मैं पाप में डूबी रही। आप ही मेरी सहायता कर सकते हैं। मैं आपकी शरण में आई हूं। आप ही मेरा उद्धार कीजिए और इस तरह कहते कहते चंचुला ब्राह्मण देवता के चरणों में गिर पड़ी।

ब्राह्मण देवता ने कृपापूर्वक उसे उठाया और कहा कि तुम सौभाग्यवती हो। भगवान शंकर की कृपा से शिव पुराण की कथा सुनकर तुम्हारा चित वैराग्य मय हो गया है। डरो मत भगवान शिव की शरण में जाओ। उनकी कृपा से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। उनकी कृपा से मैं कथा का वर्णन करता हूं। जिसके सुनने से तुम्हें उत्तम गति की प्राप्ति होगी। साथ ही तुम्हारे मन में विषयों के प्रति वैराग्य हो जाएगा।
पश्चाताप से ही पाप की शुद्धि होती है। जो पश्चाताप करता है वही वास्तव में पापों का प्रायश्चित करता है। जो व्यक्ति अपने पापों का प्रायश्चित नहीं करता उसे उत्तम गति की प्राप्ति नहीं होती। इसलिए शुद्ध मन से प्रायश्चित करने वालों की ही सद्गति होती है। प्रेमपूर्वक शिव पुराण की कथा सुनने से चित अत्यंत शुद्ध हो जाता है। शुद्ध मन में ही शिव शक्ति निवास करते हैं। इसलिए तुम दुष्ट विचारों को मन से हटा दो और भक्ति भाव से शिव की कथा सुनो। इससे तुम्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी।
इतना कहकर ब्राह्मण देवता चुप हो गए और उनका हृदय करुणा से उत्प्रोत हो गया। वह ध्यान में मग्न हो गए और चंचुला मन ही मन प्रसन्न हो गयी। ब्राह्मण देवता का उपदेश सुनकर चंचुला के नेत्रों में आनंद के आंसू छलक आए।
शिव पुराण की कथा सुनने से पापों का नष्ट होना
चंचुला की मृत्यु
शिव पुराण की कथा सुनने के लिए चंचुला ब्राह्मण देवता की सेवाओं में तत्पर हो गई और वहां रहने लगी। समय बीतता गया और ब्राह्मण देवता चंचुला को सारी शिव पुराण की कथा सुनाते रहे। जिसे सुनकर चंचुला कृतार्थ हो गई। कथा सुनने के बाद उसके हृदय में शिव के सद्गुणों का चिंतन होने लगा और वह निरंतर अभ्यास में बदल गया। कुछ समय पश्चात भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से युक्त हुई चंचुला ने बिना किसी कष्ट केअपना शरीर त्याग दिया।
शिवपुरी
जैसे ही उसने अपना स्थूल शरीर छोड़ा और सूक्ष्म शरीर धारण किया। तो भगवान शिव का भेजा हुआ एक दिव्य विमान वायु की गति से वहां पहुंच गया। जो विमान अनेक शिव दूतों से संयुक्त और भांति-भांति के शोभा साधनों से संपन्न था। चंचुला को आदर पूर्वक उस विमान पर बिठाया गया और भगवान शिव के धाम में ले जाया गया।

शिवलोक में पहुंचते ही उसके सारे पाप नष्ट हो गए और उसने दिव्य रूप धारण कर लिया। मस्तक पर अर्धचंद्र का मुकुट धारण किए हुए वह देवी शोभाशाली दिव्य आभूषणों से विभूषित हो गई थी।
महादेव का स्वरुप
शिवपुरी में पहुंचते ही उसने महादेव जी को देखा। सभी मुख्य देवता उनकी सेवा में उपस्थित थे। गणेश जी, भृंगी, नंदीश्वर और वीरभद्रेश्वर आदि। शिव का तेज करोड़ो सूर्य को भी फीका कर रहा था। उनका सारा शरीर श्वेत भस्म से युक्त था। इस तरह भगवान शंकर का दर्शन पाकर चंचुला बहुत प्रसन्न हुई और बारंबार शिव को प्रणाम करने लगी।
वह हाथ जोड़कर बड़े प्रेम और अनंत के साथ विनीत भाव से खड़ी हो गई। उसके नेत्रों से आनंद की लहरें बहने लगी तथा संपूर्ण शरीर में रोमांच जाग उठा। उस समय भगवान शंकर और माता पार्वती ने बड़ी करुणा से उसे अपने पास बुलाया और बड़े प्रेम से उसे अपनी सखी बना लिया। वह परमानंद की अवस्था में शिवलोक में निवास करने लगी।
चंचुला द्वारा अपने पति बिन्दुग का उद्धार
एक दिन परमानंद की अवस्था में मगन हुई चंचुला ने माता पार्वती को जाकर प्रणाम किया और दोनों हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगी। स्तुति करने के बाद हाथ जोड़कर चुपचाप खड़ी हो गई। उसके नेत्रों में प्रेम के आंसू आ गए। चंचुला की स्तुति से प्रसन्न होकर पार्वती जी ने चंचुला को वर मांगने को कहा।
चंचुला की प्रार्थना
चंचुला ने कहा कि “हे माते, मेरे पति बिन्दुक इस समय कहां पर हैं, मैं यह नहीं जानती। परंतु जिस प्रकार आपने मेरी सहायता की है उसी प्रकार मेरे पतिदेव से मेरा मिलन करवा दीजिए। मेरे पति वैश्या के साथ आसक्त थे और हमेशा पाप में डूबे रहते थे। उनकी मृत्यु मुझसे पहले हो गई थी। ना जाने वह कौन सी गति को प्राप्त हुआ है।”
इसके उत्तर में पार्वती जी ने कहा कि “तुम्हारा पति बहुत बड़ा पापी था। उसने मरने के बाद घोर नरकों में बहुत दुख भोगे हैं और शेष पाप कर्मों को भोगने के लिए इस समय विंध्य पर्वत पर पिशाच की योनि में पड़ा है जहाँ अनेक प्रकार के दुख भोग रहा है।”
यह बात सुनकर चंचुला पति के दुख से बहुत दुखी हो गई। वह हाथ जोड़कर पूछने लगी कि “हे माते मुझ पर दया कीजिए और पाप कर्म करने वाले मेरे पति का उद्धार कीजिए। हे देवी या फिर कोई उपाय बता दीजिए जिससे मेरे पति की कल्याण हो सके।”
पार्वती जी ने कहा कि इसका एक ही उपाय है। अगर तुम्हारे पति संपूर्ण शिव पुराण की कथा सुनते हैं तो उसके सभी पाप नष्ट हो जाएंगे और वह उत्तम गति को प्राप्त होगा।
चंचुला ने हाथ जोड़कर पार्वती जी से फिर प्रार्थना की के “मेरे पति की कल्याण के लिए आप ही कोई उपाय बताइए।” बारंबार प्रार्थना करने पर माता पार्वती को चंचुला पर दया आ गई।
गंधर्वराज तुम्बुरू

उन्होंने भगवान शिव का गुणगान करने वाले सबसे उत्तम गंधर्वराज तुम्बुरू को बुलाकर कहा कि “मैं तुम्हें एक बहुत ही आवश्यक कार्य के लिए भेज रही हूं। तुम शीघ्र ही मेरी सखी चंचुला के साथ विंध्य पर्वत पर जाओ। वहां एक महाघोर भयंकर पिशाच रहता है। वह पूर्व जन्म में बहुत बड़ा पापी था। मेरी इस सखी चंचुला का पति था। परंतु वह एक दुष्ट वैश्यगामी हो गया था। सभी धर्म-कर्म त्याग गया था। वह अस्त्र-शस्त्र लेकर हिंसा करता और लोगों को सताता था।
वह मृत्यु के बाद घोर नरक में यातनाएं सहने लगा और अपने पाप कर्मों का फल भोग कर नरकों से लाकर उसको पिशाच योनि में डाल दिया गया। अब वह सिंध्यपर्वत पर पिशाच बना हुआ है। आपसे मेरा अनुरोध है कि तुम उसके आगे यतनसील होकर शिव पुराण की कथा का प्रवचन करो। शिव पुराण की कथा सुनने से उसका हृदय शीघ्र ही सारे पापों से शुद्ध हो जाएगा। जब वह सारे पापों से मुक्त हो जाएगा तो मेरी आज्ञा से विमान पर बिठाकर भगवान शिव के समीप ले आओ।
विंध्याचल पर्वत की ओर
माता पार्वती की बात सुनकर गंधर्वराज मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए। आज्ञा का पालन करने हेतु जल्दी ही विमान पर बैठकर गंधर्वराज चंचुला के साथ विंध्याचल पर्वत की ओर चल पड़े।
वहां पहुंचकर उन्होंने उस पिशाच को ढूंढ लिया। उसका शरीर बहुत विशाल था। वह कभी हंसना तो कभी रोता और उछलता कूदता रहता। गंधर्वराज ने उसे बलपूर्वक बांध लिया और एक ऐसे स्थान पर ले गए जहां पर शिव पुराण की कथा आरंभ की जा सके।
इतने में ही संपूर्ण लोकों में यह बात प्रचलित हो गई कि गंधर्वराज ने देवी पार्वती की आज्ञा से एक पिशाच के उद्धार के लिए शिव पुराण की कथा आरंभ की है। यह बात सुनकर बहुत सारे देवर्षि और आसपास के लोग इकट्ठा हो गए।
पिशाच बिन्दुग का उद्धार
फिर गंधर्वराज ने उस पिशाच को बांधकर एक आसन पर बिठा दिया और संपूर्ण शिव पुराण की कथा बयां करनी शुरू की।सातों संहिताओं काआदर पूर्वक श्रवण करने से पिशाच ने अपने सारे पापों को धो दिया और शीघ्र ही उसका रूप दिव्य हो गया। उसके शरीर पर श्वेत वस्त्र और आभूषण प्रकट हो गए। अपनी पत्नी चंचुला के साथ मिलकर शिव के गुणगान गाने लगा। उन दोनों का चित्त परमानंद से परिपूर्ण हो गया।

शिव पुराण की कथा की संपूर्णता के बाद सभी लोग और महर्षि अपने-अपने स्थानों को लौट गए। दिव्य रूप धारी श्रीमान बिन्दुग भी अपनी सुंदर दिव्य स्त्री चंचुला के साथ विमान पर बैठकर शिवलोक जा पहुंचा। वहां पर पार्वती जी और भगवान शिव ने उनका बड़ा आदर सत्कार किया और सुखी होकर शिवलोक में आनंदपूर्वक रहने लगे।