शिव पुराण कथा सुनने से घोर पापी को शिवलोक की प्राप्ति (अध्याय-1)

शिव पुराण कथा की महिमा महान है। जो भी प्राणी मात्र इस कथा को सुनता है, कलयुग में उसकी कल्याण अनिवार्य है। श्री शौनक जी ने जब श्री सूत जी से पूछा कि शिव पुराण कथा सुनने की महिमा कितनी महान है।

श्री सूत जी ने कहा कि जो भी प्राणी शिव पुराण कथा प्रेमपूर्वक सुनता है वह मन-ईशित फल प्राप्त करता है। शिव पुराण परम उत्तम शास्त्रों में से एक है। शिव पुराण को सुनने से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है और शिवलोक को प्राप्त कर लेता है।

शिव पुराण ग्रन्थ में कुल 24 हज़ार श्लोक हैं। जिनको 7 सहिंताओं में विभाजित किया गया है। इसमें कोई संशय नहीं है कि जो भी इस ग्रन्थ को प्रेमपूर्वक, पूर्ण रूप से सुनता है। वह एक पुण्यात्मा है।

जो व्यक्ति मृत्यु के समय में भक्तिपूर्वक इस शिव पुराण कथा को सुनता है उस पर भगवान शिव अति प्रसन्न होते हैं और उसे अपने धाम में स्थान देते हैं। जो प्रतिदिन आदर पूर्वक इसका पूजन करता है वह इस संसार में सभी सुख प्राप्त करता है। शिव पुराण कथा सुनने वाले को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है। इसलिए इस ग्रंथ का प्रेम पूर्वक आदर करना चाहिए।

शिव पुराण कथा सुनने से पापी देवराज को शिवलोक की प्राप्ति

श्री शौनक जी ने जब श्री सूत जी से यह पूछा कि कलयुग में शिव पुराण कथा सुनने से कौन-कौन से पापी शुद्ध होते हैं। तो सूत जी ने इसके उत्तर में कहा के जो पापी, दुराचारी, काम, क्रोध आदि में लिप्त रहते हैं। वे अगर इस पुराण को सुनते या उसका पूजन करते हैं तो वह अवश्य ही शुद्ध हो जाते हैं। इसी विषय को श्री सूत जी ने इतिहास के कुछ उदाहरण देकर बताया कि जो भी शिव पुराण कथा सुनते हैं उनके सभी पापों का नाश हो जाता है।

सूत जी कहते हैं कि बहुत पहले की बात है, किरातों के नगर में एक ब्राह्मण रहता था जो बहुत ही दुर्बल, ज्ञानहीन और धर्म के मार्ग से भ्रष्ट हो चुका था। वह वेश्यावृत्ति में भी मलिन हो चुका था। उसका नाम देवराज था। उसपर जो भी श्रद्धा या विश्वास रखता वह उसे ठग लेता था। वह ब्राह्मण, ऋषियों, क्षत्रियों को बहाने से मार कर उनका सारा धन हड़प लेता था। वह अपना धन धर्म के किसी भी कार्य में नहीं लगता था। वह काम में इतना भ्रष्ट हो चुका था कि वह नित्य कर्म से वैश्यगामी बन गया और सभी प्रकार से भ्रष्ट हो गया।

एक दिन देवराज घूमता-घूमता झूसी-प्रयाग में पहुंच गया। झूसी-प्रयाग को पहले पृष्ठानपुर कहा जाता था। वहां उसने एक शिवालय देखा जिसमें बहुत सारे साधु महात्मा एकत्र हुए थे। देवराज उस शिवालय में चला गया और वहीं पर रहने लगा।

किंतु वहां रहने पर उसको बुखार आ गया, जिसके कारण उसके शरीर में बहुत पीड़ा होने लगी। वहीं पास में एक ब्राह्मण देवता शिव पुराण की कथा कर रहे थे। बुखार की पीड़ा में होते हुए भी देवराज के कानों में शिव पुराण कथा सुनाई दे रही थी। रोज़ कथा सुनते-सुनते एक माह बीत गया। एक मास के बाद बुखार से अत्यंत पीड़ित होकर देवराज की मृत्यु हो गई।

शिव के दूत

शिव पुराण कथा में दर्शाये गए शिवदूत

जैसे ही उसकी मृत्यु हुई यमराज के दूत वहां आ गए और उसके सूक्ष्म शरीर को पशु की भांति बांधकर बलपूर्वक यमपुरी में ले गए। गरुड़ पुराण के अनुसार यमराज जी के अनेक दूत होते हैं, जो देखने में इतने भयावय होते हैं कि उनको देखने मात्र से ही प्राणी भय से कम्पित हो जाता है। अभी कुछ ही समय बीता था कि वहां शिवलोक के दूत पहुंच गए।

शिवलोक से आए हुए शिव के दूत अति सुन्दर और उज्जवल थे। उन सभी के हाथ में त्रिशूल सुशोभित थे। उनके संपूर्ण शरीर में भस्म लगी हुई थी और गले में रुद्राक्ष की मालाएं थी। जिनको देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि स्वयं शिवजी महाराज पधारे हैं।

शिव के दूतों ने आते ही यमराज के दूतों को मारपीट कर और धमकाकर देवराज को उनके चंगुल से छुड़ा लिया। उन्होंने देवराज को अपने अत्यंत सुंदर और अद्भुत विमान पर बिठाकर कैलाश पर्वत की ओर जाने लगे।

उस समय यमपुरी में बड़ा भारी कोलाहल मच गया। उस कोलाहल को सुनकर यमराज जी स्वयं अपने भवन से बाहर आए और उन्होंने देखा कि साक्षात शिव के समान दिखने वाले शिवदूत उनके ग्रह में पधारे हैं। उन्हें देखकर यमराज जी ने विधिपूर्वक उनका स्वागत किया और पूजन किया। उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से सारा वृत्तांत जान लिया।

यमराज जी ने भय के कारण उन महात्मा दूतों से कोई प्रश्न नहीं पूछा और उल्टे उन सब की पूजा एवं प्रार्थना की। यमराज जी ने बहुत ही आदर पूर्वक उनको कैलाश के लिए रवाना किया। कैलाश पर जाते ही उन्होंने ने देवराज को स्वयं शिव के समक्ष पेश किया।

निष्कर्ष

पहले अध्याय में यह कहा गया है कि भगवान शिव की महिमा अपरंपार है। भगवान शिव ही एकमात्र ऐसे देवता है जो अपने भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति कराते हैं। इस अध्याय के माध्यम से भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और भक्ति की भावना जगाने का एक तुच्छ प्रयास किया गया है।

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