रावण, रामायण का एक ऐसा चरित्र था जो पूरे विश्व में एक खलनायक के रूप में जाना जाता है। हिंदुस्तान में हर साल रावण को जलाया जाता है, क्या वह सच में इसी लायक है?

रावण का व्यक्तित्व
सुना है कि रावण जैसा खूबसूरत मनुष्य पुरे विश्व में नहीं था। उसका कद्द 8 फुट के आस पास था। शरीर बहुत ही बलवान और रिष्ट- पुष्ट था। वह जब चलता था तो सब उसकी रोहबदार चाल देख कर मोहित हो जाते थे। उसका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि कोई भी प्रभावित होने से नहीं रह पता था।
वह कोई भिखारी नहीं था। वह एक महान राजा था। उसके राज्य के सभी घर सोने के बने थे। आर्थिक तौर पर उस समय का सबसे शक्तिशाली और समृद्ध राज्य माना जाता था। उसकी बुद्धिमत्ता का अंदाज़ा यहाँ से लगाया जा सकता है कि उस समय लंका में सौर ऊर्जा (सोलर एनर्जी) से भोजन पकाया जाता था। जिसकी खोज विज्ञानं ने हज़ारों साल बाद में की।
रावण के १० सिरों का राज़
रावण को 10 सिरों वाला कहा जाता है। ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि उसकी सोच शक्ति इतनी महान थी, विचार शक्ति इतनी प्रबल थी, याद शक्ति इतनी महान थी कि जो 10 विद्वान् सोच सकते थे वह अकेला सोचता था। वह 10 महान ज्ञानियों जितना चिंतन अकेला कर सकता था। उदाहरण के तौर पर बताया जाये तो उसे 4 वेद और कई शाश्त्र कंठित थे। वह वेदों का पाठ करने के लिए ग्रंथो का सहारा नहीं लेता था। महान से महान विद्वान भी तमाम उम्र पाठ करते है परन्तु फिर भी वेदों और शास्त्रों को कंठित नहीं कर पाते।
इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि उसका मन कितना एकाग्र होगा। याद शक्ति बहुत तीर्व हो जाती है जब मन एकाग्र होता है। जिनका मन चंचल होता है वह हर पल भूलते हैं। कुछ भी याद करने में सक्षम नहीं होते। भुलक्कड़ होते हैं। रावण का मन बहुत एकाग्र था इसलिए उसकी याद शक्ति इतनी प्रबल थी।
रावण की भक्ति
रावण की उपासना इतनी महान थी कि वह हमेशा आनंद की अवस्था में रहता था। कहते हैं जब किसी का मन किसी कार्य में एकाग्र हो जाये तो उसे ये बोध नहीं रहता कि कितना समय बीत गया है। ध्यान की अवस्था में जब कोई गहरायी में उतरता है तो समय खो जाता है। समय का बोध नहीं रहता। कई घंटो का समय कुछ पल प्रतीत होते हैं।
रावण का मन इसी तरह पूर्ण रूप से एकाग्र हो जाता था जब वह वेदो का पाठ करता था। जब ॐ नामशिवाय का जप करता था। जब वह मंत्र जप में बैठता था तो परमानन्द के रस में ऐसा विलीन हो जाता था कि कई दिन गुज़र जाते थे। इतना महान तपीश्वर था रावण। इतना महान प्रभु नाम का अभयासी था रावण।
इतना रस और परमानन्द था उसकी दुनिया में कि काल खो गया था अर्थात समय खो गया था। उसकी दुनिया में समय था ही नहीं। इसलिए कहा जाता है कि रावण ने काल को अपने वश में किया था।
शिव के प्रति असीम प्रेम
रावण शिवजी महाराज का बहुत बड़ा उपासक था। शिव की उपासना में वह इतना विलीन हो जाता था कि परमानन्द के नशे से परिपूर्ण हो जाता था। जब कोई इंसान किसी से बहुत प्रसन्न होता है तो उसे कुछ अर्पण करना चाहता है। रावण भी शिव को कुछ अर्पण करना चाहता था। परन्तु क्या अर्पण किया जाये। सब कुछ उसे तुच्छ प्रतीत हुआ। सोने के महल में रहने वाले को कुछ भी मूल्यवान नहीं लगा जो वह शिव को अर्पण कर सके। अपने आप से मूल्यवान कुछ भी न लगा। अपने आप को अर्पण करने का फैसला किया। सर काट के अर्पण कर दिया। सर महान है। और सर भी रावण का जो 10 सिरों के बराबर हो।
रावण को मुर्ख क्यों कहा गया
रावण को मुर्ख क्यों कहा गया। दुनिया भर में उसे खलनायक क्यों बना दिया गया। सब बुराईआं उससे क्यों जोड़ दी गयीं। इतनी तौहीन पुरे संसार में किसी की नहीं होती जितनी इस लंकेश की होती है। हर साल इसे जलाया जाता है। हज़ारों सालों से जलाया जा रहा है और पता नहीं कब तक इसी तरह जलाया जाएगा। हिंदुस्तान में अगर किसी व्यक्ति की बेजत्ती करनी हो तो उसका पुतला जलाया जाता है। इसका अर्थ यह है कि उसके प्रति द्वेष ज़ाहिर करना, घृणा ज़ाहिर करनी, नफरत ज़ाहिर करनी। इतनी नफरत, इतनी घृणा। आखिर क्यों ?
इस प्रश्न का एक ही उत्तर है कि रावण हार गया था। जो हार जाये वह शैतान बन जाता है और जो जीत जाये वह भगवान् बन जाता है । हिंदुस्तान के विद्वानों का ये मन्ना है कि रावण प्रभु राम से नहीं हारा था। वह अपने भाई विभीषण से हारा था। विभीषण ने ही प्रभु राम को सब राज़ बता दिए थे कि रावण कैसे मरेगा। भारत में ये कहा जाता है कि इंसान दुश्मन से नहीं हारता, अपनों से हारता है क्योकि वे सब जानते हैं।
उन दिनों स्वंवर की प्रथा प्रचलित थी। स्त्री अपना वर अपनी इच्छा से चुन सकती थी। रावण की एक बहिन थी सूर्पनखा। वह एक महान सुंदरी थी। उसकी सुंदरता उसकी नासिका की वजह से थी। अति सुन्दर थी वह।
सूर्पनखा ने जब पहली बार श्री राम जी के भ्राता लक्ष्मण को देखा तो मोहित हो गयी थी। उसी दिन उसने लक्ष्मण को अपना वर मान लिया था। परन्तु उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा के कारण इंकार कर दिया। स्वंवर के दिन सूर्पनखा ने लक्ष्मण जी के गले में वरमाला डालने की कोशिश की। लक्ष्मण जी ने क्रोध में आकर सूर्पनखा की नाक काट दी। जिस जगह उसकी नाक काटी गयी आज उस जगह को नासिक के नाम से जाना जाता है। यहाँ सूर्पनखा का मंदिर भी है।
हिंदुस्तान और आस पास के देशों का यह मानसिक सिद्धांत है, एक सभ्यता है कि इंसान किसी की भी तौहीन बर्दाश्त कर सकता है परन्तु एक भाई अपनी माँ और बहिन की तौहीन नहीं सहन कर सकता। उनके लिए वह अपने प्राण दावं पर लगा सकता है। सूर्पनखा तो एक महान राजे की बहिन थी। रावण के पास जब सूर्पनखा रोती हुई आयी तो उसमे बदले की भावना पैदा हो गयी। बस इतनी ही गलती रावण से हुई जिस वजह से आज सारे संसार में उसे जलाया जाता है। इसी वजह से इसे मुर्ख कहा गया।
सीता माता के हरण के बाद रावण ने उन्हें अशोक वाटिका में रखा। कभी भी महल में नहीं लेकर गया। सीता माता को एक देवी की तरह रखा।
हर साल रामलीला पर रावण को जलाने से पहले उसकी पूजा की जाती है। प्रशाद का भोग अर्पण किया जाता है। किसलिए ? क्योकि हर किसी के अवचेतन मन में रावण के प्रति श्रद्धा भावना भी है। क्योकि वह शिव का एक महान भक्त था। एक महान तपीश्वर था जिसने अपना सर काट कर शिव को अर्पण किया था।
अगर रावण की तुलना आज के किसी मनुष्य से की जाये तो वह एक महान सत्पुरुष प्रतीत होगा। क्योकि कलयुग के प्रभाव के कारण मनुष्य जितना पापी हो गया है वह गरुड़ पुराण में दर्शाये गए नरकों को जरूर प्राप्त होगा और नरकों की घोर यातनाएं सहेगा। मुझे पूर्ण विश्वाश है कि रावण जैसा महाज्ञानी महात्मा अवश्य शिव में विलीन हो गया होगा।