मरने के बाद की यात्रा एक बहुत ही रोचक और रहस्य पूर्ण विषय है। ईश्वर द्वारा बनाई गई यह दुनिया बहुत ही अजीबो-गरीब और रहस्यमय है। कभी-कभी ऐसी घटनाएं सुनने और पढ़ने को मिल जाती हैं, जिसके बारे में इंसान सोचने पर मजबूर हो जाता है कि यह कैसे हो सकता है।
मृत्यु भी एक ऐसी ही घटना है। हर कोई इस रहस्य से पर्दा उठाना चाहता है। मृत्यु और मरने के बाद जीवन, एक ऐसा विषय है जिसने हजारों वर्षों तक मानवता को आकर्षित किया है। दुनिया के सभी धर्म यह मानते हैं के मरने के बाद भी जीवन है लेकिन कोई इसकी पुष्टि नहीं कर सकता।
इस लेख में हम एक ऐसी ही सच्ची घटना पर चर्चा करेंगे जो इस बात की पुष्टि करती है कि मरने के बाद भी जीवन है। यह घटना ना केवल हमारी सोच को चुनौती देगी बल्कि हमें जीवन और मरने के बाद के रहस्य से पर्दा उठाने में भी सहायता करेगी।
इस लेख में हम एक ऐसे इंसान के बारे में बात करेंगे जिन्होंने मरने के बाद होने वाली घटनाओं को देखा है। उस इंसान का नाम है कंवरजीत सिंह जो सिख धर्म से संबंधित हैं और इस समय कनाडा में रह रहे हैं। इस घटना का जिक्र उन्होंने एक इंटरव्यू में किया था।
ऐसी घटनाओं को पढ़ने या सुनने से हमारी आध्यात्मिक यात्रा में बहुत सहायता होती है क्योंकि मृत्यु एक ऐसी सच्चाई है जो हमें जीवन की गहराई और जटिलता को समझने में प्रेरित करती है। यह हमें जीवन के प्रति अधिक सम्मान के साथ जीने में कृतार्थ करती है।
मरने के बाद की वह अनोखी घटना
कंवरजीत सिंह जी कहते हैं कि मेरे जीवन के 21 साल शिक्षा ग्रहण करने में ही निकल गए। पहले स्कूल में तो बाद में कॉलेज में। मैं अपने फूफा जी के घर में रहा करता था। मेरे फूफा जी और उनका सारा परिवार बहुत ही सादा जीवन जीते थे। फूफा जी के घर में धार्मिक माहौल ना के बराबर था।
मेरी मां जरूर मुझे कभी कभी जपुजी साहिब का पाठ करने को बोलती थी। ऐसा नहीं है कि मेरा ईश्वर में विश्वास नहीं था। कोई भी कार्य करने से पहले मैं गुरुद्वारे जाकर प्रार्थना किया करता था।
इसी तरह से मैंने बीएससी और एमएससी की शिक्षा सम्पूर्ण की। 1966 में जब मैं 22 साल का हुआ तो मुझे विद्यालय में शिक्षक की नौकरी मिल गई।
1970 में 3 साल बाद, मेरे साथ एक अजीब घटना घटी। संध्या का समय था जब मैं विद्यालय से लौटा था। मैं भोजन करके कुर्सी पर बैठा ही था कि सामने से दो इंसान आते हुए दिखाई दिए। बहुत ही ऊंचे, लंबे, काले और खूंखार दिखने वाले वह, इंसान नहीं लग रहे थे। उनके कान घोड़े के कान जैसे थे।
उन्होंने आते ही मुझे पकड़ लिया और बुरी तरह से मारना शुरू कर दिया। मैंने उनसे छूटने का बहुत प्रयास किया लेकिन सफल ना हो पाया। वह मुझे पकड़ कर ले जा रहे थे और बुरी तरह से मार रहे थे। मैं उनके साथ बहस कर रहा था कि आप मुझे मार क्यों रहे हैं और मुझे कहां लेकर जा रहे हैं। मुझे छोड़ दो। लेकिन वह मेरी किसी भी बात का जवाब नहीं दे रहे थे। वह बस मुझे मारते ही जा रहे थे। और बार-बार मुझे कह रहे थे कि “अब कहां है तेरे बच्चे, कहां है तेरी धर्म पत्नी”।

मैंने भी उनके साथ युद्ध करने का प्रयास किया लेकिन वह बहुत ही बलवान थे। वह मुझसे कहने लगे कि “प्राणी तुम मर चुके हो”। लेकिन उनकी बात पर मुझे विश्वाश नहीं हो रहा था क्योंकि मैं दिखने में वैसा ही लग रहा था। क्योंकि मेरी ये धारणा थी कि इंसान मरने के बाद हवा के झोंके की तरह हो जाता है।
मैं उनके साथ बहस करने लगा कि तुम असत्य कहते हो। क्योंकि मरने के बाद आपको ये एहसास नहीं होता के आप मर चुके हैं। सब कुछ कितना सत्य लगता है। उन्होंने फिर कहा कि “हे प्राणी तुम मृत्यु को प्राप्त हो गए हो”। जब दो-तीन बार उन्होंने मुझे यह कहा तो मुझे भी विश्वास हो गया कि मैं सच में मृत्यु को प्राप्त हो गया हूं। फिर मेरी समझ में आ गया कि अब कुछ नहीं हो सकता। अब मैं अपने परिजनों से कभी नहीं मिल सकता।
मुझे कोई एहसास नहीं था कि कितना समय बीत चुका है क्योंकि मरने के बाद समय का कोई अस्तित्व नहीं होता। मुझे यह भी ज्ञात नहीं हुआ के कितना सफर तय हो चुका है क्योंकि वह मुझे अंधेरे में ले जा रहे थे। चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा था। हम तीनों के अतिरिक्त वहां कोई नज़र नहीं आ रहा था।
कुछ समय पश्चात हम यमलोक में दाखिल हुए। चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ था। मेरे कानों में हाय-हाय की आवाज़ें आने लगी। मैंने अपनी दृष्टि फेर कर देखा तो बहुत ही भयंकर मंजर नज़र आया।
एक जगह पर कुछ लोगों को घी के कढ़ाहे में तला जा रहा था। किसी को उल्टा लटकाया हुआ था और जोर-जोर से हण्टरों से मारा जा रहा था। सब कुछ इतना डरावना था कि मैं बुरी तरह से कांप गया। मैं सोच रहा था कि यह सब नहीं होना चाहिए था। अब मैं कुछ नहीं कर सकता। बार-बार मुझे मेरे परिवार का ध्यान आने लगा। वह खौफनाक मंजर देखकर मैंने अपनी आंखें बंद कर ली।
कुछ समय पश्चात् मेरे कानों में बड़ी भारी आवाज सुनाई दी कि “ले आए हो इसे”। यमदूतों ने हां में जवाब दिया। मुझे समझ में आ गया कि वह सामने यमराज जी हैं। कुछ समय पश्चात उन्होंने मेरे कर्मों को देखते हुए कहा कि “इसने पूरी जिंदगी कोई अच्छा काम नहीं किया। इसको ले जाओ और लकड़ी के आरे से चीरा जाये।
मैं समझ गया कि अब मुझे लकड़ी के आरे से काटा जाएगा और मैं बुरी तरह से कांपने लगा। जैसे ही मैंने आंखें खोली तो देखा कि मेरे सामने लकड़ी का आरा रखा हुआ था। यमदूतों ने वह आरा उठा लिया और मुझे पकड़ कर पीठ के बल लिटा दिया। आरा मेरी गर्दन पर रखा गया। मुझे अत्यंत दुख और पीड़ा का अनुभव हो रहा था। मैं वहां से छूटने का प्रयास कर रहा था लेकिन मैं असमर्थ था।
आप सोच रहे होंगे मरने के बाद पीड़ा का एहसास कैसे होता होगा। धर्म ग्रंथों के अनुसार इंसान को जितनी पीड़ा स्थूल शरीर में रह कर होती है उससे कई गुणा ज्यादा पीड़ा मरने के बाद होती है। मरने के बाद हमें सूक्षम शरीर प्राप्त होता है जो ये सारी यातनाएं और दुःख का सामना करता है।
फिर आरा मेरी गर्दन पर चलाना शुरु किया। अभी आरे के कुछ दांत ही मेरी गर्दन में धसे थे कि मेरे मुंह से “वाहेगुरु” निकल गया। सिर्फ एक बार। यमदूतों के हाथों से आरा नीचे छूट गया। दाएं तरफ वाला यमदूत 15फुट की दूरी पर जा गिरा और इसी तरह बायं वाला भी दूर जा गिरा।
अचानक से वहां एक प्रकाश हो गया। मुझे किसी ने कंधों से पकड़ कर उठाया। जब देखा तो वह एक बहुत ही प्यारी संतों जैसी हस्ती थी। नरक की भयानक यातनाओं का वो मंज़र अदृश्य हो गया। उस संत ने मुझे बहुत प्रेम किया। इतना प्रेम कि इस संसार में कोई मां-बाप अपने बच्चों से भी नहीं करता। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि मुझे संसार के सारे सुख प्राप्त हो गए हैं।
कुछ समय इसी आनंद में गुजरे। फिर आकाशवाणी हुई कि “जाओ तुम्हें स्वास दिए जाते हैं। अपना जीवन पवित्र बनाकर आना। जाओ तुम्हें धरती पर अधिक समय दिया जाता है”।
मैं प्रार्थना करने लगा कि” मैं इस जगह से नहीं जाना चाहता। कृपया मुझे यहीं रहने दिया जाए”।
“नहीं तुम यहां नहीं रह सकते। यहां केवल पवित्र जीव ही रह सकते हैं”।
अगले ही पल मुझे एहसास हुआ कि मैं अपने स्थूल शरीर में वापस आ गया हूँ। जैसे ही मैने दृष्टि उठा कर देखा तो सामने अपनी धर्मपत्नी को देखा जो मेरे पैरों को रगड़ रही थी। एक तरफ मेरे दादा जी मेरे हाथों को रगड़ रहे थे। मैंने उनसे कहा कि “अब मैं ठीक हूं। मुझे छोड़ दिया जाए। अब मुझे कुछ नहीं होगा”।
कुछ देर मरने के बाद यमदूतों की मार से मेरे शरीर का अंग अंग दुख रहा था। मैं हिलने में भी असमर्थ था। मैं इसी विचार में था कि असली संसार यह नहीं है। असली संसार तो मृत्यु के पश्चात है।यह संसार तो नाशवान है, झूठ है।
उस घटना के बाद मेरा सारा जीवन बदल गया। मैं एक नास्तिक था और ईश्वर ने मुझे यह मौका दिया है कि मैं अपना जीवन पवित्र बना सकूँ और उस पवित्र स्थान पर जा सकूँ। एक महान संत के शब्द मुझे याद आते हैं जो कहते थे कि मुझे मरने के बाद के जीवन का बहुत बेसब्री से इंतज़ार है जब मैं अपने प्रीतम में विलीन हो जाऊंगा और अत्यंत सुख को प्राप्त होऊंगा। संत कबीर जी भी कहते हैं कि “मरने ते ही पाइये पूरन परमानन्द”। मरने के बाद ही आप पूर्ण परमानन्द की अनुभूति पा सकते हैं।
दुनिया के सभी धर्म यह कहते हैं कि हमारा असली घर यह नहीं है। असली घर वह है जहां हमने मृत्यु के पश्चात जाना है। यहां तो हम कुछ समय के लिए ही आए हैं। यह जीवन हमें ईश्वर द्वारा दिया गया एक बहुत ही खूबसूरत तोहफा है जिसे हम जाने-अनजाने नष्ट कर रहे हैं।