भगवान श्री चन्द जी के जीवन की रहस्मय घटनाएं

श्री चन्द जी महाराज गुरु नानक देव जी के बड़े बेटे थे। श्री चन्द जी महाराज बचपन से ही परम पिता परमेश्वर की याद में जुड़े रहते थे। कहा जाता है कि श्री चन्द जी भगवान् शिव के अवतार थे। भारत में उदासी सम्प्रदाय के रचयिता भी इन्ही को माना जाता है।

गांव के लोग पागल क्यों हो गए ?

खड़े-खड़े समाधि

बाबा श्री चन्द जी महाराज लाहौर से सुल्तानपुर जाते हुए एक मानियाले नाम के गांव में ठहरे। गांव के पास ही एक पेड़ के नीचे खड़े खड़े उनकी समाधि लग गई और वह परमात्मा की याद में जुड़ गए। उनके सेवक कमलिया जी कहीं दूर निकल गए थे।

अभी कुछ ही समय बीता था कि इस गांव का एक किसान अपनी गाय-भैंसों को चराता हुआ वहां आ गया और पेड़ की शाया में थोड़ी देर के लिए रुक गया। वहां पर उसने भगवान श्री चन्द जी को खड़े-खड़े समाधि में स्थित देखा। वह हैरान रह गया।

गांव पहुंचकर उसने सभी गांव वालों को बताया कि “गांव के बाहर एक साधु आया है जो चुप चाप खड़ा है। उसकी आंखें भी नहीं झपक रही। उसका शरीर एकदम स्थिर है। जटाधारी साधु है और उसके शरीर पर विभूति लगी हुई है। उसका चेहरा किसी नूर से चमक रहा है। आओ मेरे साथ मैं तुमको दिखलाता हूं।”

यह बात सुनकर समझदार लोग तो नहीं गए। परंतु छोटे-छोटे कुछ बच्चे और वह किसान उस पेड़ के पास श्री चन्द जी के आस पास इकट्ठे हो गए।

महापुरुष के वचनों को स्वयं ईश्वर भी नहीं टाल सकते

इतने में ही श्री चन्द जी के सेवक कमलिया जी आ गए। जैसे ही उन्होंने देखा कि कुछ बच्चे और किसान भगवान जी के आसपास इकट्ठे हुए हैं तो उनके मुख से स्वाभाविक ही यह निकल गया कि “तुम पागलों की भांति भगवान के इर्द-गिर्द क्यों इकट्ठे हुए हो। किसी भी महापुरुष के आसपास इस तरह से मिला नहीं लगाया जाता। इस तरह से उनका अपमान होता है।

इतना कहने की देर थी कि वह किसान और सभी बच्चे उसी समय पागल हो गए और गांव की तरह भाग गए। जब गांव वालों को यह पता चला तो उन्होंने आकर कमलिया जी से क्षमा की याचिका की और सभी पागलों को ठीक करने की प्रार्थना की।

श्री चन्द जी महाराज की तीन दिन बाद समाधि खुली। उन्होंने देखा कि सभी गांव वाले उनके आसपास हाथ जोड़, प्रार्थना की मुद्रा में खड़े हैं। जब भगवान जी ने सारी वार्ता का पता किया तो उन्होंने गांव वालों से कहा कि “हमारे सेवक कमलिया जी भी एक उच्च कोटि के महापुरुष हैं। इनके मुखारविंद से निकले हुए वचन अटल सिद्ध होते हैं। इनके वचन तो अब अटल साबित होंगे। परंतु इतना कर सकते हैं कि आप लोगों के गांव में एक न एक परिवार तो पागल रहेगा ही।”

परंतु फिर गांव वालों की बहुत प्रार्थनाएं करने के बाद उन्होंने दया दृष्टि की और कहा कि “ठीक है गांव में एक पागल इंसान तो रहेगा ही क्योंकि संत महापुरुष के वचनों को स्वयं ईश्वर भी नहीं टाल सकता। हम इसका असर थोड़ा कम कर देतें हैं।

इतना कहते ही श्री चन्द जी महाराज और उनके सेवक कमलिया जी वहां से सुलतानपुर लोधी की तरफ चल पड़े। 

आज तक यह गांव मनियाला पागलों का प्रसिद्ध है। इस घटना के बाद बहुत सारे लोग इस गांव को छोड़कर चले गए। आज तक इस गांव में कोई ना कोई पागल पैदा होता ही है।

गुरु अमरदास जी महाराज द्वारा अपने पुत्र को अर्पण करना

श्री गुरु अमरदास जी महाराज श्री और चन्द जी

सिखों के दूसरे गुरु श्री गुरु अमरदास जी महाराज जी को तीर्थ यात्रा का बहुत शौक था। जब वह अपने गांव बासरके( अमृतसर के पास, पंजाब) में रहते थे। तो वह 20 बार नंगे पांव गंगा माता के स्नान के लिए गए थे।

गुरु गद्दी मिलने के बाद एक दिन उनको तीर्थ यात्रा की इच्छा प्रकट हुई। उन्होंने अपने बड़े पुत्रों मोहरी जी, मोहन जी और जेठा जी (जो बाद गुरु रामदास जी बने) और अन्य सिखों के साथ सबसे बड़े तीर्थ डेरा बाबा नानक गए। वहां पर एक कुआं है जिसका नाम खुहीसर है। इसमें स्नान किया।

इसके बाद गुरु अमर दास जी, भगवान श्री चन्द जी महाराज जी के तप-स्थान टाली साहिब गए। उसके बाद बारठ साहिब पहुंच कर गुरु जी नेश्री चंद महाराज जी के दर्शन किये और निहाल हो गए।

गुरु जी के बेटे मोहन जी को देखकर श्री चंद जी महाराज ने उनमें साधुपन और योग के लक्षण देखे। गुरुजी से कहा कि यह बेटे को हमें सौंप दीजिए। गुरु जी ने उत्तर दिया कि सब कुछ आपका ही है महाराज और उन्होंने अपने बेटे को श्री चन्द जी को अर्पण कर दिया।

दाढ़ी इतनी क्यों बड़ाई हुई है ?

गुरु रामदास जी

यह बात 1636 विक्रमी की है जब भगवान श्री चन्द जी महाराज अमृतसर पहली बार आए। उस समय सिखों के चौथे गुरु श्री गुरु रामदास जी महाराज गद्दी पर बैठे थे। जब उनको यह मालूम हुआ कि भगवान श्री चन्द जी महाराज हमारे नगर आए हैं तो वह खुशी-खुशी उनके दर्शन के लिए गए।

श्री चन्द जी महाराज जी ने गुरु रामदास जी को पहली बार देखा था। जिस वजह से उनकी अग्नि परीक्षा लेनी चाही। गुरु रामदास जी की दाढ़ी के केश बहुत लम्बे थे। श्री चन्द जी महाराज जी ने गुरु जी से कहा कि “दाढ़ी इतनी क्यों बढ़ा रखी है।”

इसके उत्तर में गुरु रामदास जी ने कहा कि “आप जैसे महान साधुओं के चरण साफ करने के लिए ही यह दाढ़ी बढ़ाई हुई है।” इतना कहते ही उन्होंने अपनी दाढ़ी से श्री चन्द महाराज जी के चरण साफ करने शुरू कर दिए।

गुरु रामदास जी की निम्रता देखकर भगवान श्री चन्द जी महाराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उनका हाथ पकड़ कर अनेक वर दिये और उचारा:

तुमरी महिमा अधिक है कहियो काहे बढाहे।तुमरे सर में जो पुज्हे पापी भी गत पाहि।

बादशाह जहांगीर को भुखार का स्वरुप दिखाया

एक दिन बादशाह जहांगीर को भगवान श्री चन्द जी महाराज जी के दर्शनों की इच्छा हुई। क्योंकि भगवान श्री चन्द की वजह से ही जहांगीर का पुत्र जिंदा था। कुछ समय पहले जहांगीर का बेटा छत से गिर कर मृत्यु को प्राप्त हो गया था। उस समय भी भगवान श्री चन्द जी उसके दरबार में मौजूद थे। जहांगीर की प्रार्थना करने पर श्री चन्द जी महाराज ने उसके पुत्र को जीवन दान दिया था। उसी दिन से जहांगीर इनका बहुत आदर सत्कार किया करता था।

इसलिए वह भगवान श्री चन्द के दर्शन करना चाहता था। बादशाह ने अपने सिपाहियों को हुकुम किया के श्री चन्द जी को बहुत आदर सत्कार से पालकी में लाया जाये।

जहांगीर के सन्देश को श्री चन्द जी ने स्वीकार किया और जाने के लिए तैयार हो गए। परंतु उन्होंने पालकी को वापस भेज दिया।

उस समय श्री चन्द जी महाराज को बुखार हुआ था। उन्होंने कुछ समय के लिए बुखार को अपनी गोदड़ी में बंद कर लिया और पवन का स्वरूप धारण करके बादशाह जहांगीर के महल में पहुंच गए। जहांगीर ने बड़े आदर भाव से उनका स्वागत किया अपने पास आसन पर बिठाया।

कुछ समय वार्तालाप करने के बाद जहांगीर ने देखा कि श्री चन्द जी के पास जो गोदड़ी है वह हिल रही है। वह बहुत हैरान हुआ और पूछने लगा कि “भगवान इस गोदड़ी में ऐसा क्या है जो हिल रहा है।” तो भगवान जी ने उत्तर दिया कि “इसमें बुखार है जो हमने कुछ समय के लिए कैद कर लिया है।

जहांगीर भगवान की यह बात सुनकर और भी हैरान हो गया। यह कैसे हो सकता है तो उन्होंने श्री चन्द जी महाराज को प्रार्थना की कि मुझे इसका स्वरूप देखना है। पहले तो श्री चन्द जी उसको टालते रहे परंतु बार-बार कहने पर उन्होंने गोदड़ी का मुख खोल दिया।

जैसे ही गोदड़ी का मुख खोला गया। बादशाह को बुखार होना शुरू हो गया और वह कांपने लगा। यह देखकर बादशाह कहने लगा की भगवान इसको वापस बुला लीजिए, मैंने देख लिया है। भगवान जी ने बुखार को हुकुम करके वापस अपनी गोदड़ी में बुला लिया। इस तरह की घटना देख कर जहांगीर ने महाराज के आगे सर झुका दिया और जान लिया कि यह कोई साधारण साधु नहीं है।

ओड़िसा के राजे की बेटी में जिन

श्री चन्द जी महाराज दुनिया का कल्याण करते हुए उड़ीसा प्रांत की राजधानी कटक पहुंचे। यहां के राजा को जब यह खबर पहुंची की कोई बहुत बड़े साधु इस नगर में आए हैं तो वह झट से अपने अहलकारों के साथ दर्शनों के लिए आ पहुंचा।

यहां पहुंच कर उसे मालूम हुआ कि यह कोई साधारण साधु नहीं है। यह तो गुरु नानक निरंकारी के बड़े पुत्र श्री चन्द जी महाराज है। राजा ने हाथ जोड़कर भगवान जी के सामने विनती की कि मेरी बेटी की जान बचाइए। उसे किसी जिन ने पकड़ लिया है। हम बहुत बेबस है। कृपया हमारी रक्षा कीजिए और मेरी बेटी की जान बचाइए।

भगवान श्री चन्द जी महाराज दया का सागर हैं। उन्होंने राजा की विनती को स्वीकार किया और कहा कि “जाओ बेटी को हमारे पास लेकर आओ।” राजा जब अपनी बेटी को लेकर आए तो श्री चन्द जी महाराज निरंकार की याद में आंखें बंद करके धुनि के पास बैठे थे। (उदासी सम्पर्दाए की ये रीत है के वह जहाँ भी जातें है तो अग्नि की धुनि अवश्य जलाते हैं)

जब लड़की को धुनि के पास बिठाया गया तो उसके अंदर का जिन जोर-जोर से चिल्लाने लगा और वहां से भाग गया। कुछ ही समय बाद लड़की को होश आई और वह बिल्कुल ठीक हो गई। राजा महाराज जी के चरणों में गिर गया और सजदा करने लगा। वह इतना मेहरबान हुआ कि उसने महाराज जी के नाम 500 एकड़ जमीन उनके आश्रम के नाम करवा दी।

अचानक आम का बाग़ प्रकट हो गया

एक दिन बाबा श्री चंद्र जी महाराज बारठ साहिब, जिला गुरदासपुर, पंजाब में आए। यहां पर एक योगी रहता था जिसका नाम चर्पट नाथ था। वह अच्छी तरह से जानता था कि भगवान श्री चंद्र जी महाराज कोण हैं और वह कितनी शक्तियों के मालिक हैं।

जब उन्हें मालूम हुआ कि महाराज जी इस प्रांत में आए हैं तो उन्होंने अपने सेवक के हाथ एक आम का फल उपहार के रूप में भेंट किया। चर्पट नाथ का एक आम का बाग़ था। जिसमें वह रहता था और योग साधना किया करता था।

चर्पट नाथ का शिष्य जब श्री चन्द जी महाराज के पास पहुंचा तो महाराज जी ने कहा कि “आम का फल एक ही है। परंतु हम लोग तीन हैं। एक आम को तीन हिस्सों में बाटना मुश्किल है। योगी जी से कहिए कि तीन आम अगर हैं तो भेजिए, नहीं तो रहने दीजिये आपका उपहार हमें मिल गया।

योगी जी ने आगे से यह कह कर भेज दिया कि मेरे पास तो एक ही आम है अगर और आम चाहिए तो अपना बाग़ खुद ही उगा लीजिए।

भगवान जी ने योगी जी का उत्तर सुनकर, उसका अहंकार तोड़ने के लिए, इस एक आम को निचोड़ कर उसका रस, पास वाले खेत में छिड़क दिया। सुबह जब देखा तो उस खेत में एक आम का बाग प्रकट हो चुका था। आसपास के लोगों ने जब देखा कि यह रात- रात में फलों से युक्त आम का बाग कहां से आ गया। चर्पट नाथ ने जब यह रहस्यमई घटना देखी तो वह शर्म से लाल हो गया और इस इलाके को छोड़कर चंबे की पहाड़ियों में चला गया।

योगी जी के जाने के बाद उसका बाग़ सूख गया परंतु श्री चन्द जी महाराज का बाग बिल्कुल हरा-भरा और फलों से लढा था।भगवान जी ने नगर के लोगों से कहा कि जब तक आप इस बाग़ के फल मिल बांटकर खाते रहेंगे तब तक यह बाग़ ऐसे ही हरा-भरा रहेगा, नहीं तो सूख जाएगा। इसी स्थान पर रहते हुए भगवान जी ने एक बेरी की दातुन को जमीन में गाड़ दिया था जो एक वृक्ष बन गयी और आज तक वह कायम है।

जलती हुई छोटी लकड़ी ने वृक्ष का रूप धारण किया

कश्मीरी पंडितों की प्रार्थना

भगवान श्री चन्द जी महाराज जब कश्मीर प्रांत में गए तो वहां के पंडित मिलकर आप जी के दर्शनों को आए। उन्होंने हाथ जोड़कर विनती की कि “हे दीनबंधु, धर्म-रक्षक, शिव-अवतार, दयालु, महायोगी, बाल-ब्रह्मचारी जी, हमारी रक्षा कीजिए, कृपा हमारी कल्याण कीजिए।

श्री चन्द जी ने उनसे आने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि “यहां का हाकिम याकूब खान हिंदू लोगों पर बहुत जुल्म ढा रहा है। वह हिंदुओं को जबरदस्ती मुसलमान बना रहा है। डर के मारे सभी हिंदू इस प्रान्त को छोड़कर भाग रहे हैं। अगर इसी रफ्तार से हिंदू मुसलमान बनते रहे तो हिंदू धर्म इस संसार सेअदृश्य हो जाएगा। कृपया कीजिए आप सर्व शक्तिमान हैं। हमारे धर्म को बचा लीजिए, हमारी बहू-बेटियों की इज्जत और भारत की सभ्यता पर कलंक हो रहा है।”

श्री चन्द जी का घर-घर सन्देश

इन दुखियों की दर्द भरी कहानी सुनकर गुरु नानक पुत्र श्री चन्द जी महाराज क्रोध में आ गए और कहने लगे कि “कौन है वह दुष्ट जो हिंदी धर्म को नष्ट करना चाहता है। हमारे देश की बहू बेटियों की इज्जत से खेल रहा है। जाओ मेरा यह संदेश घर-घर में पहुंचा दो कि किसी भी कीमत पर धर्म नहीं हारना है। जो हो जाए, इस शरीर ने तो एक दिन मिट जाना है। डर कर बिल्कुल इस्लाम कबूल नहीं करना।

आपका यह संदेश घर-घर में पहुंच गया और लोगों में जोश भर गया। डरपोक लोग भी बलवान हो गए और धर्म परिवर्तन से बागी हो गए।

याकूब खान महाराज जी के पास आया

यह बातें जब वहां के हाकिम मीर याकूब खान तक पहुंची तो वह बड़े अहंकार के साथ भगवान जी के पास आया और कहने लगा कि ” हे फकीर साइ आप यह क्या कर रहे हैं। जिन हिंदुओं को मैं इस्लाम में लाना चाहता हूं उनको बागी क्यों बना रहे हैं। इससे दीन इस्लाम का बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है। आप जैसे फकीर तो अल्लाह का रूप है फिर ऐसी बगावत क्यों फैला रहे हैं। यह ठीक नहीं है।

महाराज जी उस समय धुप में ही विराजमान थे। याकूब खान कहने लगा कि “आप तो इतने बड़े तपस्वी होकर भी धूप में बैठे हैं। जो खुद को छाया नहीं दे सकता वह दूसरों को कैसी छाया देगा।”

वह रहस्मय घटना

जलती हुई लकड़ी ने एक वृक्ष का रूप धारण कर लिया

श्री चन्द जी ने जब याकूब खान की ऐसी बातें सुनी तो उसका अहंकार तोड़ने के लिए आप ने धुनि की जलती हुई एक लकड़ी को उठा लिया और पास में जमीन में गाड़ दिया। देखते ही देखते उस जलती हुई लकड़ी ने एक वृक्ष का रूप धारण कर लिया।

मीर याकूब खान ने यह घटना देखी तो वह आश्चर्य से चकित हो कर रह गया और कुछ भी बोलने में असमर्थ हो गया। उसने देखा कि ऊपर से वृक्ष जल रहा है परंतु नीचे से हरी हरी टहनियां और पत्तियां निकल रही है।

इतना देखते ही वह जोर से बोलने लगा “सुभान-अल्लाह, सुभान-अल्लाह” और कहते-कहते भगवान जी के चरणों पर गिर पड़ा। कहने लगा कि “हे फकीर साइ, मुझे क्षमा कीजिए। मुझसे गुस्ताखी हुई है। मुझे माफ कीजिए।”

भगवान जी ने याकूब खान को उठाया और कहा कि “खुदा तो एक ही है। यह दुनिया तो उस खुदा का एक घर है, एक बाग़ है, जिसमें अलग-अलग मजहब अलग-अलग फूलों को दर्शाते हैं। धूप और छांव उसके हुकुम से होती है। उसकी इजाजत के बिना तो एक पत्ता भी नहीं हिलता। ऐसे खुदा को हर वक्त याद करना चाहिए और हर धर्म का आदर भाव से सत्कार करना चाहिए। इस तरह याकूब खान ने जात-पात में भेद भाव करना छोड़ दिया और हिंदुओं पर से हर तरह की पाबंदी को हटा दिया।

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