भगवान श्री चंद्र जी महाराज और २० मील लम्बी बाजू की अविश्वसनीय घटना

भगवान श्री चंद्र जी महाराज गुरु नानक देव जी के बड़े पुत्र थे। बचपन से ही श्री चंद्र जी महाराज समाधि की अवस्था में रहते थे। माना जाता है के श्री चंद्र जी महाराज शिव जी के अवतार हैं। उन्होंने हिस्दुस्तान में उदासीन सम्प्रदाय की शुरुआत की। वे एक महान त्यागी बाल ब्रह्मचारी शक्तियों के भंडार थे।

उनको भीषम समजती भी कहा जाता है। आप जहाँ भी जाते दो वक़्त सत्संग करते और संगत को प्रभु नाम के सिमरन की महिमा का उपदेश देते।

लक्ष्मी दास जी की सचखंड यात्रा

शिव अवतार, गुरु नानक पुत्र, श्री चंद्र जी महाराज के एक छोटे भाई थे जिनका नाम लक्ष्मी दास था। वह भी भगवान श्री चंद्र जी महाराज की तरह ही एक तपस्वी महाज्ञानी और शक्तियों के भंडार थे।

एक दिन लक्ष्मी दास जी जंगल में शिकार खेलने गए और वहां से एक हिरण का शिकार करके लौटे। हिरण को अपने कंधों पर लादकर जैसे ही घर के प्रांगण में आए तो भगवान श्री चंद्र जी महाराज समाधि में विलीन थे। उनके आगमन से महाराज की आंखे खुली।

उन्होंने देखा कि लक्ष्मी दास जी जंगल से शिकार खेल कर आए हैं और एक जानवर को अपने साथ लेकर आए हैं। भगवान श्री चंद जी ने कहा कि “शिकार खेलना अच्छी बात नहीं है। इससे बहुत सारे निर्दोष जीवों की जान जाती है। आपको इसका हिसाब देना पड़ेगा।”

परंतु लक्ष्मी दास जी ने प्रश्न किया कि “हम तो गुरु नानक देव जी के पुत्र हैं। हमारा हिसाब नहीं हो सकता। हमारे पिताजी स्वयं ईश्वर का अवतार हैं। तो हमारा हिसाब माफ हो जाएगा।

परंतु श्री चंद्र जी ने कहा कि “ईश्वर की दरगाह में सबका हिसाब अपना-अपना अलग-अलग होता है। इसमें कोई दो राय नहीं है। इसलिए आपको इसका हिसाब देना ही पड़ेगा।

यह सुनकर लक्ष्मी दास जी कुछ भावुक हो गए और किसी अद्भुत रंग में आ गए। उन्होंने क्रमंडल से जल अंजुली में लिया और मृत हिरण के ऊपर डाल दिया। जिससे हिरण फिर से जीवित हो उठा।

भगवान् श्री चंद्र जी महाराज

लक्ष्मी दास जी अत्यंत वैराग्य की अवस्था में चले गए और जाकर अपना घोड़ा तैयार करने लगे। अपनी स्त्री को कहा कि “बेटे धर्मचंद को तैयार करो हम दरगाह में जा रहे हैं।” यह बात सुनकर उनकी पत्नी स्तम्भ रह गयी। कुछ समय उसी मूक अवस्था में रहने के बाद स्वीकृति में सर हिलाया। वे भी अपने पति की अवस्था को भलीभांति जानती थी।

कुछ समय पश्चात लक्ष्मी दास जी घोड़े पर सवार हो गए। अपनी स्त्री और बेटे धर्मचंद को भी घोड़े पर विराजमान किया। जाने से पहले भगवान श्री चंद्र जी से कहने लगे कि “भ्राताश्री हमें आज्ञा दीजिए। हम सचखंड जा रहे हैं। अपना हिसाब देने के लिए” इतना कहते ही वे घोड़े समेत आकाश में उड़ गए।

२० मील लम्बी बाजू

कुछ समय पश्चात भगवान श्री चंद्र जी महाराज को यह ज्ञात हुआ कि वह तो उदासीन हैं, आजीवन बाल ब्रह्मचारी ही रहेंगे। उनके छोटे भ्राता तो ग्रहस्ती थे। अगर वह यहां से चले गए तो गुरु नानक देव जी की वंशावली ही खत्म हो जाएगी। उधर लख्मीदास जी अपने घोड़े पर सवार परिवार समेत आकाश मार्ग से तेजी से जा रहे थे।

इतना विचार करते ही उन्होंने अपनी बाजू आकाश की तरफ बढ़ा दी। घोड़ा चार योजन ( 20 मील) ऊपर जा चुका था। श्री चंद्र जी ने अपनी बाजू चार योजन लंबी करके बालक धर्मचंद जी को घोड़े से उतार लिया और वापस ले आए।

श्री चंद जी महाराज के एक सेवक थे जिनका नाम कमलिया जी था वह हर वक्त महाराज जी के साथ रहते और उनके खाने पीने की व्यवस्था करते। खूब सेवा करते जिस वजह से उनमें भी रिद्धियां सिद्धियां आ गई और वह भी हमेशा ईश्वरी नाम के रंग में रंगे रहते।यह सारा दृश्य कमलिया जी देख रहे थे। वह यह सब देख कर धन्य धन्य कर उठे।

बालक धर्मचंद का अध्भुत पालन पोषण

उसी दिन से भगवान श्री चंद्र जी महाराज ने बालक धर्मचंद का पालन पोषण शुरू किया। श्री चंद्र जी महाराज तो त्यागी थे। बच्चों के पालन पोषण में वह बहुत उलझ गए थे। इतिहास में यह कहा गया है कि जब भी बच्चे को भूख लगती तो महाराज जी अपने पैर का अंगूठा बालक के मुंह में डाल देते और शक्ति से अंगूठे में से दूध आता और बालक पेट भर के दूध पीता। इसी तरह से बालक का पालन पोषण होता रहा।

बहुत बार ऐसा होता कि महाराज जी समाधि में बैठे होते और बालक धर्मचंद पीछे से आकर उनके कंधों पर बैठ जाता। कभी उनके कान के कुंडल खींचता तो कभी उनकी जटाओं को खींचता। भगवान श्री चंद्र जी की समाधि खुल जाती और वह हंस कर कहते कि “ईश्वर कितना महान है और एक अलग ही रंग में आ जाते और बालक को खूब प्यार करते।

इस तरह समय गुजरता गया और बालक बड़ा होता गया। भगवान श्री चंद्र जी यह देखकर बड़ा प्रसन्न होते कि उनके पिताजी की वंशावली अब इस दुनिया में अटल रहेगी। महाराज ने धर्मचंद जी को अपना शिष्य बनाया और पूरे संसार में प्रचलित किया।

भगवान श्री चंद्र जी ने धर्मचंद की शादी की जिनसे उनके दो पुत्र हुए। एक का नाम उन्होंने माणकचंद रखा और दूसरे का नाम मेहरचंद रखा। आज भी पंजाब में डेरा बाबा नानक जगह है जिसके बाजार के दो हिस्से हैं। एक हिस्सा माणकचंद जी के नाम पर है और दूसरा मेहरचंद जी के नाम से प्रसिद्ध है।

आज भी उनके वश में अगर किसी का विवाह करना हो तो पहले उसको भगवान श्री चंद्र जी महाराज जी की विभूति लगाई जाती है। विभूति लगाने पर कुछ तो वैराग्य अवस्था को प्राप्त हो जाते हैं और इस दुनिया के जंजाल से उपराम हो जाते हैं। वे एक त्यागी साधु बन जाते हैं और जो विभूति लगाने पर वैराग्य अवस्था में नहीं आते। वह ग्रस्त मार्ग को अपनाते हैं और बेदी वंश इसी तरह से चलता रहता है।

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