श्री चंद्र जी महाराज – गुरु नानक पुत्र और शिव अवतार-१

श्री चंद्र जी गुरु नानक के ज्येष्ठ पुत्र थे। उनका जन्म बेदी कुल, सुलतानपुर लोधी, जिला कपूरथला, पंजाब में 1551 बिक्रमी को हुआ। उनकी माता का नाम सुलक्खनी जी था। श्री चंद्र जी का जन्म उस समय हुआ जब हिंदुस्तान पर जुल्म के काले बादल छाए हुए थे। बाबर के अधीन सारा हिंदुस्तान उस समय जल रहा था।

शिव अवतार श्री चंद्र जी

श्री चंद्र जी के जन्म समय उनके कान में मांस के कुंडल और तन पर राख कुदरती तौर पर मौजूद थी। सारे सुल्तानपुर में यह खबर फैल गई कि गुरु नानक के घर एक अद्भुत बालक ने जन्म लिया है। जो भी बालक को देखता यही कहता कि सचमुच में यह शिवजी का अवतार है।

बालक श्री चंद्र के नूरानी चेहरे के दर्शन करके तन और मन शीतल हो जाते थे। इस अद्भुत बालक के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से लोग आने लगे। श्री चंद्र जी के दादाजी कल्याण दास (गुरु नानक देव जी के पिताजी) हर आये गए को भर भर कर झोलियां दान देने लगे।

गुरु नानक देव जी के माता जी श्री तृप्ता देवी जी को सब लोग आकर शुभकामनाएं देने लगे और कहने लगे के पहले आपके घर ईश्वर ने गुरु नानक के रूप में जन्म लिया और अब आपके पोते के रूप में स्वयं भोलेनाथ शिव जी महाराज ने जन्म लिया है आप बहुत ही भाग्यशाली है।

श्री चंद्र जी के माता जी सुलक्खनी जी बताते हैं कि बालक के जन्म के कुछ समय पहले उन्हें शिवाजी महाराज जी के सपने में दर्शन हुए थे। गुरु नानक देव जी भी यह भविष्यवाणी कर रहे थे की आने वाले समय में यह बालक बहुत ही भजनिक, तपस्वी, बाल- ब्रह्मचारी और तेजस्वी होगा और उदासीन संप्रदाय का जन्मदाता होगा।

बचपन की अद्भुत घटनाएं

अमूल्य रत्नो की भिक्षा

जब श्री चंद्र जी 4-5 साल की अवस्था में थे तो उनके घर एक साधु भिक्षा मांगने आया। बालक के माता जी और बुआ जी अंदर किसी काम में व्यस्त थे। इसलिए वह आवाज़ नहीं दे पाए। कुछ ही दूरी पर श्री चंद जी अपनी ही धुन में खेल रहे थे।

जब उन्होंने देखा कि दरवाजे पर कोई साधु आया है तो वह झट से अंदर गए और छोटे से हाथ में भिक्षा लेकर आए। जैसे ही साधु ने दीक्षा लेने के लिए हाथ आगे किया तो क्या देखते हैं कि बालक के हाथों में हीरे मोती पुखराज जैसे अमूल्य रतन हैं। जिन्हें देखकर साधु स्तंभ रह गया और उसने वह भिक्षा लेने से इनकार कर दिया। बालक श्री चंद्र जी मुस्कुरा कर कह रहे थे कि ले लो।

इतनी देर में अंदर से उनके माताजी और बुआ जी आ गए। साधु को सामने देखकर उन्होंने नमस्कार किया। बालक के छोटे-छोटे हाथों में जब माताजी ने हीरे और मोती देखे तो स्तंभ रह गए। माता जी द्वारा पूछने पर बालक ने मुस्कुराते हुए कहा कि वह सामने जो चने का भंडार रखा है उसी में से कुछ चने इनको दे रहा हूं। लेकिन यह लेने से इनकार कर रहे हैं। यह अद्भुत घटना देखकर सब हैरान रह गए।

माता जी को तो पहले से ही मालूम था कि यह शिवजी के अवतार हैं तो उन्होंने मुस्कुरा कर साधु से कहा कि यह भिक्षा ले लीजिए और अपने जीवन के कुछ पल आराम से गुज़ारिए। यह ईश्वर का प्रसाद समझ कर रख लीजिए। साधु धन्य धन्य करता हुआ वहां से चला गया।

जंगल में मंगल

श्री चंद्र जी महाराज बचपन से ही पालथी मार कर समाधि में बैठे रहते थे। अपने पिताजी की तरह ही वह निरंकार में अपनी सुरती को एकाग्र करके किसी परमानंद की अवस्था में रहते थे। कभी-कभी तो वह बच्चों के साथ खेलते खेलते समाधि की अवस्था में चले जाते और अदृश्य हो जाते थे। सभी बालक यह अद्भुत घटना देखकर हैरान रह जाते।

कभी-कभी श्री चंद्र जी दूर जंगलों में निकल जाते और वहां धूणा लगाकर बैठ जाते थे। जहां शेर चीते तथा अन्य भयानक जंगली जानवर आकर आपकी परिक्रमा करके आपको नमस्कार करके बैठ जाते। कभी-कभी तो ऐसा नजारा देखने को मिलता कि शेर, बकरी, हाथी, लोमड़ी सब इकट्ठे आकर आपके समीप घण्टों किसी परमानन्द की अवस्था में बैठे रहते। श्री चंद जी ने जहां मानवता का कल्याण किया वही खूंखार जानवरों का भी उद्धार किया। श्री चंद्र जी महाराज अनेक रिद्धियों और सिद्धियों के मालिक थे।

कई बार लोग गुरु नानक के घर आकर उनकी माता जी को कहा करते कि आपका बालक शेर हाथी और खूंखार जानवरों के साथ कई प्रकार के खेल खेलता रहता है। जिससे घबराकर माताजी उनको लाने के लिए गांव के लोगों को भेजते थे।

 जब गहरे जंगल में यह लोग जाते तो वहां धूणे के पास श्री चंद जी महाराज और उनके इर्द-गिर्द हाथी, शेर, चीते, सांप और अन्य जंगली जानवरों को देखकर वापस आ जाते। वे आपस में बात करते की यह कोई महान शक्ति है जो संसार में आई है जिसके पास इतने खूंखार जानवर भी परमानंद की अवस्था में बैठे रहते हैं।

वापस आकर वह माताजी को सारा हाल सुनाते कि आपका बालक तो कोई पैगंबर है। इसके इर्द-गिर्द इतने सारे जानवर बड़े प्रेम से रहते। आपको फिक्र करने की जरूरत नहीं है।

आंतरिक इच्छा की पूर्ति

बुआ ननकी जी के मन में यह इच्छा हुई कि एक बार श्री चंद जी के दर्शन हो जाए। बुआ जी की आंतरिक इच्छा को जानते हुए श्री चंद्र जी अगले ही दिन घर आ गए और बुआ जी से कहने लगे कि आप हमें याद कर रहे थे। हम हाजिर हैं बोलिए क्यों याद किया। बुआ जी ने कहा कि आपके दर्शनों की प्यास थी इसलिए आपको याद किया।

इतनी देर में आसपास की स्त्रियों इकट्ठी होकर आ गई और नमस्कार करके आपके चरणों में बैठ गई। आप जी ने सबको आशीर्वाद दिया और कहा कि यह संसार मिथ्या है, सब पदार्थ झूठे हैं, दुख के रूप हैं। संसार का मोह दुखों का घर है। माया एक नागिन की तरह है जिसके डंक मारते ही इंसान नेरकों का भागीदार हो जाता है और अनंत समय के लिए नरकों में भयानक यातनाएं भोगता है।

इसलिए हमने संसार के पदार्थ त्याग दिए हैं और घर छोड़ दिया है क्योंकि सारा ही संसार एक परिवार है और दुखी है। इसके दुख दूर करने हैं। आप सभी लोग धर्म की सच्ची कमाई करो, सत्य बोलो, सेवा करो, लोक और परलोक आपका सफल हो जाएगा ।इतना कहकर आप फिर जंगल की तरफ चले गए।

पंडित सोमनाथ का अहंकार तोड़ना

पंडित हरदयाल जी से अपने विद्या प्राप्त की। जब गुरु नानक देव जी के पिताजी मेहता कल्याण दास जी ने श्री चंद्र जी को अति वैराग्य की अवस्था में देखा तो उन्होंने पंडित पुरुषोत्तम दास के पास कश्मीर में भेज दिया। वहां पर आपने विद्या ग्रहण की। कुछ समय पश्चात वहां एक अहंकारी पंडित सोमनाथ त्रिपाठी आ गए। जिन्हें अपनी शास्त्र विद्या पर बड़ा अहंकार था। उन्होंने कई महान पंडितों को शस्त्र विद्या में हराया था। परंतु भगवान श्री चंद्र महाराज जी से शस्त्र विद्या में वह बुरी तरह हार गए और उनका अहंकार टूट गया।

श्री चंद्र जी महाराज ने बहुत दूर-दूर जाकर मानवता का कल्याण किया। आप काबुल, सिंध, हैदराबाद, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, अफगानिस्तान और अन्य कई इलाकों में जाकर जन कल्याण हेतु विचरते रहे। अपने आजीवन अपने रहने के लिए कभी कुटिया का निर्माण नहीं किया। आप 150 साल बाल ब्रह्मचारी रहे और दुनिया भर में उदासीन संप्रदाय को प्रचलित किया। 

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