बाबा श्री चंद जी के जीवन के अलौकिक चमत्कार

जगन्नाथ पुरी में अलौकिक चमत्कार

बाबा श्री चंद जी जगन्नाथ पुरी में

एक दिन बाबा श्री चंद जी और कमलिया जी किसी दरिया के किनारे ईश्वर के प्रेम में विलीन थे। कमलिया जी बाबा जी से कहने लगे कि “महाराज मैंने जगन्नाथ पुरी के बारे में बहुत सुना है। सुना है कि वह एक बहुत बड़ा और महान धाम है। मैं उसके दर्शन करना चाहता हूं। मेरा यह ख्याल है कि आप भी मेरे साथ जगन्नाथ पुरी दर्शनों के लिए चले।”

महाराज जी मुस्कुराए और कहा कि “ठीक है कमलिया जी हम तुम्हारे साथ चलने के लिए तैयार हैं। जाओ इस दरिया में छलांग लगा दो।”

कमलिया जी बाबा श्री चंद जी के घनिष्ठ सेवक थे। जो उनकी आज्ञा का हर वक्त पालन करते थे और वह जो भी कहते बिना प्रश्न किये पालन करते। इसलिए उनके कहने पर कमलिया जी ने दरिया में छलांग लगा दी।

जैसे ही वह जल से बाहर आए तो देखा कि वह किसी और ही स्थान पर पहुंच गए हैं। उन्होंने देखा कि आसपास बहुत चहल-पहल है। बहुत से लोग इधर-उधर आ-जा रहे थे। उन्होंने एक मुसाफिर से पूछा कि “यह कौन सा स्थान है।” उसने जवाब दिया कि “इस स्थान को जगन्नाथपूरी कहते हैं।” कमलिया जी यह सुनकर हैरान रह गए और आश्चर्य से इधर-उधर देखने लगे। वह बहुत खुश भी हुए।

वह दर्शन करने के लिए मंदिर की ओर चल पड़े। जब मंदिर के सामने पहुंचे तो देखा कि सामने शिव-अवतार बाबा श्री चंद जी धुनि जलाकर ईश्वर की याद में बैठे हुए थे। उन्हें देखकर कमलिया जी ने आश्चर्य से पूछा कि “महाराज आप यहां कब पहुंचे” बाबा जी ने उत्तर में कहा कि “जब आप आए, आपके साथ ही हम आए।”

बाबा श्री चंद जी और कमलिया जी के बीच अभी बातचीत हो ही रही थी कि मंदिर के पुजारी जी वहां आ गए और कहने लगे कि “आरती का समय हो गया है। जगन्नाथ जी को भोजन का भोग लगाना है। आप कृपया मंदिर से बाहर चले जाइए। बाबा श्री चंद जी और कमलिया जी मंदिर से बाहर आ गए और दूर धुनि जलाकर बैठ गए।

उधर मंदिर के पुजारी ने आरती के लिए जगन्नाथ जी के आगे भोजन की थाली राखी और आरती शुरू की। आरती समाप्त होने के बाद पुजारी जी ने देखा कि ना तो वहां जगन्नाथ जी की मूर्ति है और ना ही भोजन की थाली। यह सब देखकर पुजारी जी बहुत हैरान हुए और यहाँ वहां ढूंढने लगे। मूर्तियों के गायब होने से मंदिर में हाहाकार मच गई।

इधर भगवान बाबा श्री चंद जी महाराज ने कमलिया जी से कहा कि “आप मंदिर के पुजारी को जाकर कहिए कि “भोजन का थाल और जगन्नाथ जी की मूर्ति हमारे पास है। यहां आकर ले जाइए।” जब कमलिया जी ने मंदिर के पुजारी को यह संदेश दिया तो वहां के सभी भगत-जन बाबा जी के पास आ गए। उन्होंने देखा कि धुनि के पास जगन्नाथ जी की मूर्ति और भोजन की खाली-थाली रखी हुई है। वे सभी बाबा श्री चंद जी के चरणों में गिर पड़े और बारंबार दंडवत करने लगे।

बाबा श्री चंद जी ने कहा कि “पुजारी जी भोजन तो हमने ग्रहण कर लिया है। यह थल और मूर्तियां आप मंदिर में ले जाइए। यह बात जब जगन्नाथ पुरी के राजा ने सुनी तो बाबा जी केदर्शन करने के लिए नंगे पांव चलकर आया। आकर बाबा जी के चरणों में प्रणाम किया और विनती की कि “हे शिव स्वरूप, गुरु नानक पुत्र श्री चंद जी महाराज, आप धन्य है। आप महान है। हमारी भी कल्याण कीजिए। मैं आपके नाम 500 एकड़ जमीन लगवाना चाहता हूं। ताकि जब भी कोई साधु या संत आपकी इस स्थान पर आए तो आप जी से ही अन्न और जल ग्रहण करें। 

बाबा श्री चंद जी ने जमीन लेने से इनकार कर दिया और वहां से वापस आ गए। परंतु राजा ने आपके जाने के बाद उस स्थान के लिए आपके नाम पर जमीन लगवा दी। वह आज भी उसी तरह से कायम है। उस पवित्र स्थान का नाम बाबा श्री चंद जी के नाम से प्रसिद्ध है। यह स्थान समुद्र के किनारे जगन्नाथ मंदिर से 600 मीटर की दूरी पर है। 

बाबा श्री चंद जी ने ज़मीन से जल प्रकट किया

पठानकोट से तीन मील की दूरी पर एक स्थान है। जिसका नाम ममून है। आज इस जगह पर फौज का बहुत बड़ा बेस कैंप है। यह स्थान डलहौजी रोड पर पड़ता है। इसी स्थान पर एक दिन भगवान श्री चंद जी ने कुछ समय विश्राम किया था।

एक दिन महाराज जी दातुन कर रहे थे। कुछ ही दूरी पर कुछ औरतें जल लेकर जा रही थी तो भगवान जी ने कहा कि “थोड़ा जल दे दीजिए, कुरली करनी है।” औरतों ने जल देने से इंकार कर दिया और कहा कि “बहुत दूर से जल लेकर आए हैं। हम कैसे आपको दे दें। अगर शक्ति है तो यहीं से जल प्रकट कर लो।”

यह बात सुनकर बाबा श्री चंद जी ने अपना चमटा जमीन पर मार दिया और पानी का चश्मा निकाल दिया। इस पानी से आप जी ने कुरली की और स्नान भी किया।

शहर में जब यह बात पता चली तो शहर के लोग दर्शनों के लिए आ गए। आज इस स्थान पर एक बहुत सुंदर मंदिर है और भगवान श्री चंद महाराज जी की चरण पादुका भी मौजूद है। इस स्थान पर सुबह-शाम आरती होती है और सारे गांव के लोग श्रद्धा से कीर्तन और सेवा करते हैं।

पत्थर की शिला पर नदी पार की

मॉमून से चलकर भगवान श्री चंद जी महाराज चंबे को चले गए। जब रावी नदी पर पहुंचे तो एक साधु ने बताया कि चंबे का राजा चर्पट नाथ योगी के वश में है। योगी ने अपनी शक्तियों से राजा को अपने वश में किया हुआ है। नदी पर सभी मलाहों को यह सख्त हिदायत है कि किसी भी साधु-संत को नदी पार नहीं करानी।

मलाह ने बाबा श्री चंद जी से कहा कि” मैं मजबूर हूं महाराज, मैं आपको नदी पार नहीं करवा सकता। कृपया मुझे माफ कीजिए।” महाराज जी ने उसी समय एक पत्थर की शिला को इशारा किया कि “अब तुम ही चलो और हमें नदी पार करवाओ। देखते है चर्पट योगी में कितनी शक्ति है।” इतनी बात कहने की देर थी कि पत्थर की वह शिला अपने आप पानी पर आ गई। बाबा श्री चंद जी उस पर असवार हो गए और आसानी से नदी पार कर ली।

मलाह और लोगों ने जब यह घटना देखी तो वह श्री चंद जी महाराज के चरणों पर गिर पड़े। चर्पट नाथ योगी को जब यह पता चला कि भगवान श्री चंद जी महाराज चंबे में दाखिल हो गए हैं, तो वह डरता हुआ भगवान जी के दर्शन को आया और नमस्कार करने लगा।

भगवान जी ने कहा कि “योगी जी आप पहले गुरदासपुर के इलाके से भी इसलिए निकल गए थे कि आप अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल करते हैं। यहां आकर भी आपने यही सब करना शुरू कर दिया है।” योगी जी ने श्री चंद जी से माफी मांगी और वह स्थान भी छोड़कर चला गया।

जिस पत्थर की शिला पर भगवान श्री चंद्र जी महाराज ने रावी नदी पार की थी। वह पत्थर की शिला आज भी मौजूद है। पुजारी रोज उसकी धूप-दीप करते हैं और पूजा करते हैं। पहले इस शिला की पूजा एक संत किया करते थे जो बाद में ग्रहस्ती हो गए। आज तक उसका परिवार यह सेवा संभाल कर रहा है।

चंबे के राजा को वर दिया

चंबे के राजा को जब यह मालूम हुआ कि भगवान श्री चंद जी महाराज इस इलाके में आए हैं। तो वह दर्शनों के लिए महाराज जी के पास गया और जाकर नमस्कार की।

राजा ने महाराज जी के सामने हाथ जोड़कर विनती की ” हे दीनदयाल आप महान हैं, दया के सागर है, हे गुरु नानक पुत्र आप जैसा इस संसार में कोई जपी-तपी नहीं है। कृपया मेरी भी कल्याण कीजिए। महाराज मेरे कोई पुत्र नहीं है, जो इस राज्य का उत्तराधिकारी हो। आप शिव के अवतार हैं। कृपया मेरी विनती को स्वीकार करें। वैसे तो मैं एक राजा हूं। परंतु आपके दर का भिखारी मेरी विनती स्वीकार कीजिए।

श्री चंद्र जी भगवान को राजा पर बहुत दया आयी और उन्होंने उनको 2 पुत्रों का वर दिया। बाद में राजा के दो पुत्र हुए तो राजा ने श्री चंद भगवान जी के लिए कुछ जमीन नाम लगवा दी। जो आज भी उसी तरह से कायम है।

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