बादशाह जहांगीर का मरा हुआ पुत्र फिर जीवित हो उठा

बादशाह जहांगीर महान शासक अकबर का पुत्र था। बादशाह जहांगीर का जन्म 30 अगस्त 1569 ई को फतेहपुर सीकरी में हुआ। जहांगीर का पूरा नाममिर्जा नूरुद्दीन बेग मोहम्मद खान सलीम था। उसे शेखु बाबा के नाम से भी जाना जाता था। बादशाह अकबर के मरने के बाद तख्त पर बैठते ही उसने अपना नाम जहांगीर रख लिया।

भगवान श्री चंद्र जी महाराज

भगवान श्री चंद्र जी महाराज

एक दिन लाहौर में अपने दरबार में बैठे हुए बादशाह जहांगीर ने अपने मुरशद साईं मियां मीर जी से यह पूछा कि जिस प्रकार मैं हिंदुस्तान का बादशाह हूँ। इसी प्रकारआप फकीरों में भी आपका कोई ना कोई बादशाह होगा। जो जपि तपी त्यागी और ब्रह्मचारी होगा।

तो साईं मियां मीर जी ने बादशाह को बताया कि आज के फकीरों के बादशाह श्री गुरु नानक देव जी के बडे साहिबजादे भगवान श्री चंद्र जी महाराज हैं। आप यह समझ लीजिए की अल्लाह पाक ने स्वयं धरती पर आकरअवतार लिया है।

तब बादशाह जहांगीर ने कहा कि मैने उनकी बातें तो बहुत सुनी है परंतु उनके कभी दर्शन नहीं हुए। साईं जी ने कहा कि फ़र्ज़ तो यह है कि आप स्वयं चलकर उनके दर्शन कीजिए और आशीर्वाद प्राप्त कीजिये क्योंकि फकीर तो अल्लाह पाक के भेजे हुए ऐसे जीव होते हैं जो जगत कल्याण के लिए ही अपना जीवन व्यतीत करते हैं। आप हिंदुस्तान के बादशाह हैं। आपके पास अगर फुर्सत नहीं है तो आप शाही सवार भेज कर बड़े आदर और सत्कार के साथ उनको अपने दरबार में बुला लीजिए।

बादशाह जहांगीर के शाही कार्यों में व्यस्त होने के कारण उन्होंने अपने वजीर को हुकुम किया कि वह कुछ एहलकारों को साथ लेकर जाए और भगवान श्री चंद्र जी महाराज को हाथी की शाही असवारी पर कद्राबाद के जंगलों से बड़े आदर और सत्कार के साथ लाहौर लाया जाए।

अगले दिन वज़ीर अपने अहलकारों और शाही हाथी को लेकर चल पड़े और तीन-चार दिन की यात्रा के बाद कद्राबाद के जंगलों में पहुंच गए। 

वहां पहुंच कर वजीर ने भगवान जी के समक्ष बादशाह जहांगीर की विनती सुनाई और कहा कि बादशाह खुदआपके दर्शनों को आना चाहते थे परंतु शाही कार्यों में व्यस्त होने के कारण वह नहीं आ सके। इसलिए उन्होंने हमें आपको लाने के लिए आज्ञा की है। सो कृपा कीजिए और शाही सवारी पर बैठ कर हमारे साथ चलने की कृपालता कीजिए।

जब शाही हाथी ज़मीन में धस गया

जब शाही हाथी ज़मीन में धस गया

भगवान श्री चंद्र जी महाराज ने वजीर से कहा कि हमें बादशाह जहांगीर की विनती मंजूर है। परंतु हम सवारी नहीं करेंगे। यह हमारा एक कंबल आप हाथी पर ले जाइए हम पीछे-पीछे आते हैं।

महाराज जी से एक अहलकार ने कम्बल लिया और हाथी पर रख दिया। कंबल रखते ही हाथी जोर जोर से चिंघाडने लगा। देखते ही देखते उसकी चरों टांगे जमीन में धस गई। हाथी व्याकुल हो उठा। श्री चंद जी महाराज ने अहलकार को इशारा किया और हाथी से कंबल उतारने को कहा। जैसे ही कंबल को हटाया गया हाथी जमीन के ऊपर आ गया।

यह आश्चर्यजनक घटना देखकर वजीर और उसके अहलकार भगवान श्री चंद्र जी महाराज के चरणों में गिर गए। भगवान जी की इलाही सूरत देखकर उन्होंने साक्षात रसूल के दर्शन किए। उन्होंने हाथ जोड़कर महाराज जी से विनती की कि अब हमारे लिए क्या हुक्म है। हम आपके लिए कौन सी असवारी का इंतजाम करें क्योंकि अगर आप पैदल गए तो बादशाह सलामत हमसे नाराज़ हो जाएंगे।

भगवान् श्री चंद्र जी महाराज ने कहा के आप डरिये मत हम आपकी पूरी सहायता करेंगे। बादशाह आपको कुछ नहीं कहेगा। आप शाही सवारी लेकर जाइये हम जल्दी ही लाहौर पहुंचेंगे।

बादशाह जहांगीर के पुत्र की मृत्यु

जब वजीर अपने अहलकारों के साथ चले गए। तो भगवान श्री चंद्र महाराज हवा का रूप होकर कुछ ही मिनटों में लाहौर पहुंच गए। जब बादशाह जहांगीर को पता चला कि भगवन श्री चंद्र जी लाहौर पहुंच गए हैं, तो वह अपने लाहो-लश्कर के साथ बड़े ही आदर और सतिकार के साथ महाराज जी को लेने आया। दरबार में पहुंचते ही उसने श्री चंद जी को एक ऊँचे सिंघासन पर बिताया। जितने भी सभा में मौजूद वज़ीर-अमीर थे, सब ने श्री चंद जी महाराज को सिजदा किया और अपने-अपनी जगह पर जाकर बैठ गए।

बादशाह जहांगीर और श्री चंद्र महाराज जी के बीच काफी देर तक मार्फ़त की वार्तालाप चलती रही। कुछ समय पश्चात एक नौकर बादशाह के पास सन्देश लेकर आया कि आपका पुत्र महल की छत्त से खेलता हुआ नीचे गिर गया है और मृत्यु को प्राप्त हो गया है। इतना सुनते ही बादशाह घबरा गया और भगवान जी से आज्ञा लेकर अपने महल की तरफ भाग गया।अपने मृत पुत्र की देह को देखते ही रुदन करने लगा।

इस विरलाप के समय में बादशाह की रानी यह कहने लगी के जहाँ-पनाह आप फकीरों और पाक रूहों को तंग ना किया करें। उसी का नतीजा है जो हमको आज यह दिन देखना पड़ रहा है। (सिखों के पांचवे गुरु, गुरु अर्जन देव जी की शहीदी का कारण भी जहांगीर ही था)

बादशाह को यह ख्याल आया की अल्लाह-पाक ने खुद हमारे महल में भगवन श्री चंद्र जी को भेजा है। क्यों न उनके समक्ष ये विनती की जाये के “हे महाराज मुझ पर कृपा करो और इस बच्चे को जीवन दान दो।”

मरे हुए पुत्र को जीवनदान

यह ख्याल आते ही बादशाह जहांगीर नेअपने पुत्र को उठाया और राज दरबार में ले आया। मृत बेटे को महाराज जी के सामने लेटाकर, हाथ जोड़कर विनती करने लगा के “महाराज मुझ पर दया करो और मेरे पुत्र को जीवन दान दो”।

बादशाह के आंसू देख कर श्री चंद जी महाराज को बहुत दया आई। अपने करमंडल से अंजुली में जल लिया और मृत बच्चे के मुख पर डाला और फरमाया कि “उठ बच्चा बाहर जाकर महलों में खेलो”। इतना कहते ही बच्चे ने आँखें खोली और उठ कर बैठ गया। यह आश्चर्य घटना देखकर बादशाह समेत सभी दरबारी हैरान रह गए और सिजदा करने लगे।

दरबार के सभी लोग बादशाह जहांगीर को मुबारकबाद देने लगे और माहौल बहुत ही खुशनुमा हो गया। इसी बीच भगवान श्री चंद्र महाराज वहां से गायब हो गए। बच्चों की मां बहुत खुश थी परंतु उसके मन में यह अफसोस भी था कि वह श्री चंद्र महाराज जी के दर्शन नहीं कर पाई।

700 बीघा जमीन की भेंट

महारानी ने बादशाह जहांगीर से यह अर्ज़ की कि “महाराज, भगवान श्री चंद्र जी महाराज ने हमारे बच्चे को जीवन दान दिया है। हम हिंदुस्तान के बादशाह होने के बावजूद भी उनका धन्यवाद नहीं कर पाए। यह हमारा फर्ज बनता है कि हम उनके स्थान पर जाएं और उनसे आशीर्वाद लें और धन्यवाद करें।

क्योंकि भगवान जी हमारे पास आए, हमारे बच्चे को जीवन दान दिया, शाही हाथी उनके कंबल का वजन भी नहीं उठा पाया। इन बातों से यह मालूम होता है कि भगवान श्री चंद्र महाराज अल्लाह पाक का नूर है। ऐसी विचार करते हुए सब ने कद्राबाद जाने का फैसला कर लिया।

एक दिन अच्छा सा अवसर देख कर बादशाह जहांगीर अपनी रानियों, शाही-लश्कर के साथ, अनेक हीरे, लाल, जवाहरातों के थाल भर कर तोहफों के रूप में कद्राबाद के जंगलों में श्री चंद्र जी के अस्थान पर पहुंच गया। बड़े ही आदर और सत्कार के साथ उन्होंने महाराज जी को सजदा किया और लाई हुई भेंट उनके चरणों में अर्पण की।

बादशाह द्वारा दिए गए इतने बहुमूल्य रत्नों को देखकर महाराज जी ने कहा कि “हम तो जंगलों के निवासी हैं। हमें इन शाही नजरानों से कोई वास्ता नहीं है और ना ही हमें इनकी जरूरत है। आप किसी जरूरतमंद यह तोहफे दे दीजिए। यह कहकर उन्होंने सभी तोहफे वापस कर दिए।

फिर बादशाह कहने लगा कि “अगर आप चाहे तो मैं आपके लिए एक महल की उसारी इस जंगल में करवा देता हूं” परंतु भगवान श्री चंद्र महाराज जी ने कहा कि हम तो दरवेश हैं। हमें इन वस्तुओं की कोई ज़रूरत प्रतीत नहीं होती। हम तो त्यागी हैं। हमें इस संसार के जनजालों में नहीं पड़ना।

जब बादशाह ने देखा कि भगवान तो किसी भी वस्तु को लेने से इंकार कर रहे हैं। तो उसने धर्मचंद जी (जो श्री चंद्र महाराज जी के भाई के पुत्र थे) उनके नाम 700 बीघा जमीन का भेंट कर दिया।

श्री चंद जी महाराज ने फिर भी यह स्वीकार नहीं किया। परंतु बादशाह जहांगीर के बार-बार विनती करने पर महाराज जी मान गए। बादशाह बहुत ही खुश हुआ और अपनी रानियों, दरबारियों के साथ बड़े आदर और सत्कार के साथ सजदा करके लाहौर वापिस चला गया।

नानक चक

नानक चक

इस स्थान पर भगवान श्री चंद्र जी महाराज काफी समय के लिए रहे। जिस वजह से इस स्थान का नाम “भगवान श्री चंद्र का प्रज्ञान” पड़ गया। परंतु बाद में महाराज की ने इसका नाम अपने पिताजी के नाम से “नानक चक” रख दिया जो आज भी इसी नाम से जाना जाता है।

यह स्थान डेरा बाबा नानक, जिला गुरदासपुर, पंजाब से 9 मील की दूरी पर स्थित है। इस जगह भगवान श्री चंद्र जी महाराज का बड़ा सुन्दर मंदिर भी बना हुआ है। हर साल इस अस्थान पर उनका जन्मदिन बड़ी ही धूम धाम से मनाया जाता है।

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