पीर सुलेमान प्रेत का उद्धार : एक महान संत की अनोखी गाथा-१

सुलेमान प्रेत एक पीर से प्रेत कैसे बना। इस लेख में हम एक अनोखी और सच्ची कहानी के बारे में जानेंगे। ये कहानी एक इंसान के प्रेत बनने से लेकर एक महान संत द्वारा उसका उद्धार किये जाने तक की है। ये कहानी एक आत्मा की हज़ारों वर्षो की यात्रा की है।

प्रेत योनि

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जैसे गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण, गुरु ग्रन्थ साहिब आदि में बताया गया है कि ईश्वर द्वारा बनाये गए इस संसार में अनेक योनियां है। जिनकी कुल गिनती 84 लाख बताई गयी है। 42 लाख योनियां जल में और 42 लाख योनियां धरती पर। इन योनियों में भूत, प्रेत, पिशाच, यक्ष अदि, भी आते हैं।

ये योनियां इंसान के कर्मों का प्रतिफल होती हैं। इन योनियों में इतने भयानक दुःख भोगने पड़ते हैं कि अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है। हमारा स्थूल शरीर 5 तत्वों से बना होता है। अग्नि, आकाश, धरती, वायु और जल। परन्तु प्रेत योनि में शरीर 2 तत्वों से बना होता है।आकाश और अग्नि से। जिस कारण से प्रेत हमेशा जलन में रहते हैं। इनको कभी शांति नहीं मिलती।

सुलेमान प्रेत की कहानी

पीर सुलेमान ईरान में रहने वाला एक पीर था। जो जायज़ नजायज तरीकों से पैसा एकत्रित करता था। वह प्रेत रूहों को कैद करके अपना काम करवाता था। वह एक हमलावर की फ़ौज के साथ हिंदुस्तान आया था। यहाँ आकर एक गाँव मुग़लखेड़ा में उसने अपना बसेरा किया। इसी गाँव में उसने निकाह किया, जिससे उसे एक बेटी हुई।

इसी तरह से समय गुज़रता गया। उसकी बेटी अब बड़ी हो गयी थी। पीर सुलेमान के घर के पास एक साधु रहता था, जिसका पीर सुलेमान की बेटी के साथ सम्बन्ध स्थापित हो गया। कुछ समय पूर्व यह नाज़ायज़ सम्भन्ध गहरा हो गया। पीर को जब इसके बारे में पता चला तो उसने उस साधु को और अपनी बेटी को समझाने की कोशिश की परन्तु वह सफल न हो सका। उसने उस वक़्त की हुकूमत के ज़रिये भी साधु को समझाने की बहुत कोशिश की। इसी गम में वह बहुत मायूस रहने लगा। वह अल्लाह ताला से रोज़ उस साधु से बदला लेने के लिए दुआ करने लगा। इसी गम से एक दिन उसकी मौत हो गयी।

बाद में संत महाराज जी के पूछने पर सुलेमान ने बताया था कि उसकी मौत के वक़्त उसे 4 यमदूत लेने आये थे। जिनको देखते ही उसकी जिह्वा बंद हो गयी थी। वह कुछ भी बोलने में असमर्थ हो गया था। उन दूतों ने आते ही उसे मारना शुरू कर दिया। स्थूल शरीर से सूक्षम शरीर को अलग किया गया। यह प्रक्रिया इतनी पीड़ादायक थी कि इसे बयान नहीं किया जा सकता।

उसने बताया कि उसे यमलोक ले जाया गया जिसमे १ वर्ष का समय लगा। इस १ वर्ष में उसे अनंत यातनाओं से गुजरना पड़ा। गरुड़ पुराण में नर्क के भयंकर रास्तों का वर्णन बहुत ही विस्तार पूर्वक किया गया है।

उसे यमलोक में यमराज के समक्ष पेश किया गया। सभी कर्मो को देखते हुए उसे यमराज जी द्वारा कुम्भीपाक नर्क की सजा सुनाई गयी। गरुड़ पुराण के अनुसार नरकों की गणना 84 लाख है जिसमे से कुम्भीपाक नर्क कुल 21 बताये गए हैं। जिसमे महान पापी जीवों को भेजा जाता है। इन कुम्भी पाक नरकों में जीव अनंत कल्पों तक यातनाएं भोगते हैं।

जब कुम्भीपाक नर्क में ले जाया गया तो उसका प्रवेश द्वार मात्र 1 इंच का था जिसमे से सुलेमान का प्रवेश कराया गया। वह नर्क तक़रीबन 4 हज़ार योजन बड़ा था। उस नर्क में मल मूत्र के अनेक कुंड थे। जिसमे पापी जीव को डुबाया जाता था। इसके अतिरिक्त अनेक भयानक यातनाएं है जिसे पापी जीव को अनंत वर्षों तक भोगना पड़ता है। फिर उसे 84 लाख योनियों में डाल दिया जाता है। जब तक कि उसके पाप कर्म पूरी तरह समाप्त न हो जाएँ।

सुलेमान ने बताया कि उसे अनंत काल तक नर्क की यातनाएं सहने के बाद फिर यमराज जी के समक्ष पेश किया गया। जिसमें उन्होंने सुलेमान द्वारा प्रेतों को अपने वश में करने और उनसे काम करवाने के जुर्म में १००० साल प्रेत योनि की सजा सुनाई। उसके बार बार यमराज जी के आगे शमा प्रार्थना करने पर यमराज जी ने भविष्यवाणी की कि उसका उद्धार एक महान संत ईशर सिंह द्वारा १००० साल बाद किया जायेगा जो उसे मनुष्य योनि प्रदान करेंगें। और वहीं वह अपनी साधु से प्रतिशोद लेने की आखरी इच्छा की पूर्ति भी कर सकेगा।

प्रेत योनि मिलने पर वह सहारनपुर अपने गांव मुगलखेड़ा में रहने लगा जहाँ उसकी कब्र थी। वहां 5 प्रेत पीर और भी रहते थे जो अनंत काल तक प्रेत योनि में रह रहे थे।

सुलेमान प्रेत द्वारा साधु से प्रतिशोद

सुलेमान प्रेत के 1000 वर्ष अब पुरे होने को थे। इधर शेर सिंह नाम के एक व्यक्ति अपने परिवार के साथ मुगलखेड़ा में आ बसे। उनके 4 बेटे और 2 बेटियां थी। सबसे छोटे बेटे का नाम मनमोहन सिंह था।

कुछ समय पश्चात एक दिन शेर सिंह अनजाने में अपने बेटे मनमोहन सिंह के साथ सुलेमान की कब्र पर पहुँच गया। नादान होने के कारण मनमोहन सिंह ने कब्र पर पेशाब कर दिया। सुलेमान ने जैसे ही उसे देखा तो पहचान गया कि यह वही साधु है जिसने आज से 10 जन्म पहले उसकी बेटी के साथ नाज़ायज़ सम्भन्ध स्थापित किया था। जिसके गम से उसकी मृत्यु हुई थी। आज वह इस साधु से अपना बदला पूरा करेगा।

सुलेमान ने मनमोहन सिंह को अपने वश में कर लिया। मनमोहन सिंह ने मानसिक संतुलन खो दिया। शेर सिंह ने अपने बेटे को बहुत हकीमों और तांत्रिकों को दिखलाया परन्तु सब विफल रहा। जब पूरी तरह से सुलेमान ने मनमोहन सिंह को अपने कब्ज़े में कर लिया तो वह अपनी ही आवाज़ में बात करने लगा। उसने मनमोहन सिंह को बहुत तड़पाया और अपना बदला पूरा किया। परन्तु वह उसे मार नहीं सकता था क्यूंकि मनमोहन सिंह के ज़रिये ही उसका उद्धार होना था।

उसके जिस्म में रहते हुए सुलेमान को सात साल हो गए थे। अब वह समय आ गया था जब सुलेमान और मनमोहन सिंह दोनों का उद्धार होना था।

महान संत द्वारा सुलेमान प्रेत का उद्धार

108 संत ईशर सिंह जी महाराज

108 संत ईशर सिंह जी महाराज एक महान संत थे जो सिख धर्म से संभंधित थे। जिन्होंने अपने जीवन में अनंत जीवो का उद्धार किया। उन्होंने नाम जप द्वारा अनेक जीवों को परमात्मा से जोड़ा। कहा जाता है कि उनके सत्संग में त्रिदेव, ब्रह्मा विष्णु महेश स्वयं आते थे।

एक दिन शेर सिंह अपने परिवार के साथ महाराज जी के दर्शन करने आया। मनमोहन सिंह (सुलेमान प्रेत) संत जी के पास नहीं जा सका। उसने महाराज जी तक प्रार्थना स्वरुप सन्देश पहुंचाया कि संत जी अपने आभामंडल (aura) को कम करें क्योंकि संत जी के आभामंडल में दाखिल होने से प्रेत के शरीर को आग लग जाती है।

महान संत ने उसकी प्रार्थना स्वीकार की और अपने पास बुलाया। संत जी के पूछे जाने पर सुलेमान ने मनमोहन सिंह द्वारा अपनी व्यथा कह सुनाई। जिसे सुन कर पास बैठे लोग हैरान रह गए।

अपनी कहानी सुनाने के बाद सुलेमान संत जी से बार बार अपने दुखों से निजात पाने की प्रार्थना करने लगा। जिसे सुन कर संत जी महाराज मुस्कुराये और आशीर्वाद दिए।

प्रेत उद्धार की प्रिक्रिया

अपने कल्याण के लिए जब सुलेमान ने प्रार्थना की, तो संत जी महाराज ने उसके समक्ष कुछ प्रश्न रखे। पहला प्रश्न था कि वह किस घर में पुनर्जन्म लेना चाहता है। क्योंकि सुलेमान का प्रेत योनि से कल्याण तभी हो सकता था जब वह पुनः मनुष्य योनि में आकर ईश्वर का भजन सिमरन जप करे। इसीलिए संत जी ने उसे यह प्रश्न किया कि वह किस घर में पुनर्जन्म लेना चाहता है। अमीर या गरीब घर में।

इसके उत्तर में सुलेमान ने प्रार्थना की कि “अमीर या गरीब से कोई ताल्लुक नहीं है, परन्तु ऐसे घर में जन्म हो जिसमें ईश्वर की इबादत की जा सके। जिस घर में मास और मदिरा का सेवन न हो।” संत जी बहुत प्रसन्न हुए।

संत ईशर सिंह जी के एक सेवक जो संत जी के साथ रहा करते थे और उनकी सेवा करते थे। उनका नाम गुरदेव सिंह था। उनके विवाह को 14 वर्ष हो गए थे परन्तु उनके कोई पुत्र नहीं था। जब संत जी और सुलेमान के बीच ये वार्ता चल रही थी तो गुरदेव सिंह वहीँ मौजूद थे। उन्होंने संत जी से प्रार्थना की कि अगर हज़ूर चाहें तो सुलेमान का जन्म मेरे ग्रह में करा दें क्योंकि मेरे कोई पुत्र नहीं है। संत जी ने गुरदेव सिंह की इस प्रार्थना को स्वीकार किया।

संत ईशर सिंह जी बालक गुरबख्शीश सिंह(सुलेमान प्रेत)  के साथ

महान संत ईशर सिंह जी ने सुलेमान के लिए परमात्मा से प्रार्थना की। कुछ समय पश्चात 5 अगस्त 1968 को गुरदेव सिंह के ग्रह में एक बालक ने जन्म लिया। जिसकी देख रेख संत जी महाराज ने खुद की। 5 वर्ष की आयु तक संत जी ने इस बालक को कोई नाम नहीं दिया। 5 वर्ष के बाद संत जी ने इसका नाम गुरबख्शीश सिंह रखा। इस बालक को 5 वर्ष की आयु तक ये ज्ञात था इसका पूर्व जन्म का नाम सुलेमान था और वह 1000 साल तक प्रेत योनि में था।

निष्कर्ष

इस कहानी से यह सिद्ध होता है कि मृत्यु के बाद भी जीवन है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार अनेक योनियां, अनेक नर्क, अनेक स्वर्ग और अनेक ही लोक है जिसमे अनंत जीवो का वास है।

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