दिवाली का त्यौहार: सिख और हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार

सिख धर्म में दिवाली का त्यौहार

दिवाली का त्यौहार जिसे सिख धर्म में बंदीछोड़ दिवस के नाम से जाना जाता है। यह त्यौहार सिखों के छठे गुरु हरगोबिंद साहिब जी के साथ जोड़ा जाता है।

गुरु हरगोबिंद साहिब जी का जन्म 15 जून 1595 ई को गुरु की वडाली, अमृतसर में हुआ। उनके पिता गुरु अर्जन देव जी सिखों के पांचवें गुरु थे और उनकी माता का नाम गंगा जी था।

यह कहानी तब शुरू होती है जब अकबर बादशाह के बाद सन 1605 में जहांगीर तखत पर बैठा। गुरु अर्जन देव जी की शहीदी के बाद गुरु हरगोबिंद साहिब जी सिखों के छठे गुरु के रूप में उभरे।

guru arjan dev ji

मिरी और पीरी की दो तलवारें

सिखों के पहले पांच गुरु शांतिपूर्वक रहे। परंतु छठे गुरु गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने मिरी और पीरी की दो तलवारें पहनी। एक तलवार शांति का प्रतीक थी और दूसरी तलवार युद्ध नीति का प्रतीक। गुरु जी ने सिखों के अंदर जुल्म के खिलाफ लड़ने के लिए ही यह दो तलवारें धारण की थी।

गुरुजी ने समय की नजाकत को समझते हुए अकाल-तखत की सृजना की। उन्होंने सिखों को शस्त्रधारी होने और घुड़सवारी के हुक्म जारी किए। जुल्म का नाश करने के लिए सिख नौजवानों को आगे आने को कहा और उनकी शस्त्र विद्या और घुड़सवारी की तालीम शुरू की।

जहांगीर बादशाह से मुलाकात और शेर का शिकार

इस तरह की चर्चाएं जब बादशाह जहाँगीर के पास पहुंची तो वह सोच में पड़ गया। उसने गुरु साहिब जी को मिलने की इच्छा प्रगत की। बादशाह के दरबार में वजीर खान और गुंचा बेग जैसे अहलकार थे। जो गुरु साहिब के श्रद्धालु भी थे। उनके द्वारा गुरु हरगोबिंद साहिब जी को खत भेजा गया। गुरु साहिब जी ने मुख्य सिखों से विचार किया और बादशाह से मिलने का फैसला किया।

जहांगीर बादशाह द्वारा गुरु जी का दिल्ली में शाही स्वागत किया गया। जहांगीर रोज़ गुरुजी से मिलने आता और लंबी बातचीत होती। एक दिन जहांगीर ने गुरु हरगोबिंद साहिब जी को शिकार खेलने के लिए आमंत्रित किया। गुरु साहिब जी ने आमंत्रण स्वीकार किया और जंगल में जाने के लिए तैयार हो गए।

अगले दिन जब बादशाह और गुरुजी जंगल में गए तो वहां के स्थानीय लोगों ने बताया कि यहां पर एक बहुत खूंखार शेर रहता है। जो आज तक का सबसे लंबा, चौड़ा और भयानक शेर था। जिसने कई शिकारियों को मार डाला था।

गुरु जी शेर का शिकार करते हुए

कुछ दूर जाते ही इस शेर ने हमला कर दिया। गुरुजी ने बंदूक का सहारा नहीं लिया और सिर्फ तलवार से ही उस शेर का सामना किया। गुरु जी ने एक ही झटके में शेर के दो टुकड़े कर डालें। गुरु जी का जाहो जलाल, शानो शौकत, शाह सवारी, वीरता और शस्त्र विद्या के कमाल देखकर बादशाह का दिल और बैठ गया।

सच्चा पातशाह

कुछ दिन बाद जहांगीर गुरु जी के साथ आगरा की तरफ चल पड़ा। रास्ते में जहां-जहां गुरुजी ठहरते लोग बड़ी श्रद्धा के साथ उनसे मिलने आते और सच्चा पातशाह कहकर विनती करते। भेंट में अलग-अलग पदार्थ देते। यह सारा कुछ देखकर जहांगीर बादशाह ने गुरु जी से प्रश्न किया कि लोग आपको सच्चा पातशाह क्यों कहते हैं। गुरु जी ने कहा कि यह तो परमात्मा ही जानते हैं।

आगरा के पास पहुंचकर गुरु जी और जहांगीर का तंबू अलग-अलग लगाया गया। कुछ समय पश्चात आगरे का रहने वाला एक गरीब सिख गुरुजी से मिलने आया। वह सिख घास बेचकर अपना गुजारा किया करता था। वह बड़े प्रेम से गुरु जी के घोड़े के लिए अच्छा-अच्छा घास इकट्ठा करके लेकर आया था। साथ में एक टका भी भेंट के तौर पर लाया था।

सच्चे पातशाह

जहांगीर का तंबू उसके रास्ते में पहले आता था। सिख ने तंबू के पास पहुंच कर सिपाही से कहा कि सच्चे पातशाह के दर्शन करने हैं। सिपाही थोड़ा हैरान हुआ और बादशाह के तंबू की तरफ इशारा कर दिया। जैसे ही सिख अपने साथ घास लेकर जाने लगा तो सिपाही ने रोक दिया। बादशाह तंबू के अंदर से सब देख रहा था। उसने सिख को अंदर आने की अनुमति दे दी।

सिख ने आते ही बादशाह के सामने सिर झुकाया और एक टका और घास अर्पण किया। फिर बड़े अदब से बोला कि “सच्चे पातशाह बहुत देर से आपके दर्शनों की प्यास मन में थी। कृपया मुझे जन्म-मरण से मुक्त करें और नाम की दात से विचारों को खत्म करके जीवन सफल करें।

सिख की बात सुनकर बादशाह बहुत खुश हुआ और कहने लगा कि हम तुम्हारे ऊपर बहुत खुश हैं। मैं सारे भारत का बादशाह हूं। जो भी मांगोगे धन-पदार्थ, सोना, हीरे, मोती, मैं सब तुमको दूंगा।

सिख ने जब यह बात सुनी तो कहा कि “मैं भूल गया था महाराज। मैं तो सच्चे पातशाह को मिलने आया था। सिर्फ सच्चे पातशाह ही मेरे लोक और परलोक के मालिक हैं।

इतना कहते ही सिख ने एक टका उठाया और घास को सर पर रखा और बाहर जाने लगा। जहांगीर ने कहा कि बादशाह के आगे रखी हुई भेंट उठाते नहीं है। तू यह पैसा रहने दे मैं तुझे बहुत सारा धन दूंगा। पर सिख ने एक भी बात नहीं सुनी और जल्दी-जल्दी तंबू से बाहर आ गया।

जहांगीर को समझ में आ गया कि लोग मेरे को बादशाह और गुरु साहब को सच्चा पातशाह क्यों कहते हैं।

जब सिख गुरु हरगोबिंद साहिब जी के पास पहुंचा तो घास और एक टका रखते हुए शीश झुकाया और कहने लगा की “हे सच्चे पातशाह आपने मुझ गरीब पर बहुत दया की है जो मुझे माया के जाल से बचा लिया। कृपया मेरा जन्म और मरण खत्म कीजिए और ईश्वरी नाम से रंग दीजिए। गुरु साहिब उठे और सिख को गले से लगा लिया और कहा कि तेरा लोक और परलोक संवार दिया।

गुरु जी ग्वालियर के किले में

दूसरी तरफ गुरु से ईर्ष्या करने वाले लोगों ने बादशाह के सलाहकारों को लालच दिया ताकि वह बादशाह को वहम में डाल सके। उन्होंने एक ब्राह्मण को सोने की मोहरें दी और बादशाह को इस वहम में डाल दिया कि उसके ऊपर कोई ऊपरी हवा है। यह तभी ठीक हो सकती है जब कोई महापुरुष एकांत में बैठकर 40 दिन ईश्वर की आराधना करें।

बादशाह के सलाहकारों ने यह सलाह दी कि गुरु हरगोबिंद साहिब जी से बड़ा महापुरुष कौन है। आप उन्हीं से जाकर विनती कीजिए। ताकि वह ग्वालियर के किले में आपके लिए ईश्वर की बंदगी करें।

बादशाह को भी एक बहाना मिल गया कि वह गुरु साहब को इस तरह से कैद कर सकता है। उधर गुरु साहिब तो सब जानते थे उन्होंने मुस्कुरा कर विनती स्वीकार की।

गुरु जी को पांच सिखों के साथ ग्वालियर के किले में भेज दिया गया। बादशाह ने रोज 500 मोहरों से गुरु साहिब जी की सेवा के लिए आदेश दिए। परंतु गुरु साहिब बादशाह की दी हुई माया से कुछ भी ग्रहण नहीं करते थे। गुरु साहिब के सिख ग्वालियर शहर में जाकर वहां पर मजदूरी करते और उसका भोजन तैयार करके गुरु साहब को खिलाते।

ग्वालियर का किला शाही कैदियों के लिए था। जहांगीर ने 52 राजे वहां पर कैद किए हुए थे। जो बहुत ही दुख में अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। गुरु साहिब के किले में आने से वहां का माहौल धार्मिक हो गया और राजे चिंता मुक्त होने लगे। किले का दरोगा हरिदास गुरु साहब की संगत करके पूरी तरह से बदल गया।

एक दिन राजाओं ने गुरु साहिब जी से प्रश्न किया की जहांगीर ने आपको चालाकी से किले में नजरबंद कर दिया है। हम भी इसी तरह से नजर बंद हुए थे। इस किले से कोई भी जिंदा बाहर नहीं जाता। इस वजह से हम बहुत दुखी हैं। परंतु आप हमेशा किसी परमानंद की अवस्था में रहते हैं, कीर्तन करते हैं, आप इतना आन्दित कैसे रह सकते हैं।

गुरु जी ने उत्तर में कहा कि ” मैं तो उस वाहेगुरु का एक दरवेश हूं। उसकी याद में समय व्यतीत करना। यही मेरा काम है। यही मेरा जीवन है। मैं खुश इसलिए भी हूं क्योंकि मुझे ईश्वर ने यहां एकांत में सिमरन करने के लिए यह वक्त दिया है।

राजाओं ने कहा कि आप 40 दिन तक यहां रहेंगे तो गुरु साहिब ने कहा कि मेरे मालिक ने जिस कार्य के लिए मुझे यहां भेजा है मुझे वह पूरा करना है इसलिए मैं यहां आया हूं।

राजाओं ने कहा कि आप धन्य है। हमारे ऊपर भी कृपा कीजिए और हमें भी सही मार्ग दिखलाइए। गुरुजी ने सबको ईश्वर का सिमरन करने के लिए कहा।

दिवाली का त्यौहार (बंदी छोड़ दिवस )

५२ राजे रिहा किये

बहुत समय गुरु जी का ग्वालियर के किले में रहने के कारण सिख संगत में विद्रोह बढ़ने लगा। जिस कारण दूर-दूर से सिख संगत गुरु जी के दर्शनों के लिए आने लगी। इस विद्रोह की खबर जब जहांगीर को पहुंची तो वह फिक्र करने लगा और बीमार रहने लगा।

जहांगीर के बीमार होने से उसकी बेगम नूरजहां ने साइ मियां मीर जी तक खबर पहुंचाई। साईं मियां मीर जी एक महान फकीर थे जिनके हाथों से गुरु अर्जन देव जी ने हरमंदिर साहिब की नींव रखवाई थी।

साईं जी को जब यह मालूम हुआ कि जहांगीर ने गुरु हरगोबिंद साहिब जी को ग्वालियर के किले में कैद किया है। तो उन्हों ने जहांगीर से कहा कि खुदा के नूर को अगर कैद रखोगे तो तुम सुखी कैसे रह सकते हो।

जहांगीर ने साइ जी के सामने अपनी गलती कबूल की और गुरु हरगोबिंद साहिब जी को छोड़ने का फैसला किया। गुरु जी ने बाहर आने से इनकार कर दिया क्योंकि वे चाहते थे कि सारे राजा भी उनके साथ रिहा हों। जहांगीर ने गुरु जी से दरख्वास्त की कि अगर यह राजे भी बाहर आ गए तो उस से जंग करेंगे तो गुरु जी ने उत्तर में कहा कि यह राजे तुमसे युद्ध नहीं करेंगे यह हमारा वादा है।

जहांगीर ने कहा कि ठीक है आपकी पोशाक पड़कर जितने राजे बाहर आ सकते हैं वह आ जाएं। गुरु जी ने अपने सिखों को एक ऐसी पोशाक बनाने के लिए कहा जिसमें 52 कलियां हों।

गुरु जी ने 52 कलियों वाली पोशाक पहनी और सारे 52 राजे गुरु जी की पोशाक पड़कर बाहर आ गए और जोर-जोर से कहने लगे “जय दाता बंदीछोड़, जय दाता बंदीछोड़”।

इस तरह से श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी का नाम दाता बंदीछोड़ भी पड़ गया। ग्वालियर के किले में आज एक बहुत ही खूबसूरत गुरुद्वारा है जिसका नाम गुरुद्वारा बंदीछोड़ है।

दिवाली वाले दिन ही गुरु जी ने 52 राजाओं को रिहा किया था। इसीलिए सिख धर्म में दिवाली वाले दिन को बंदीछोड़ दिवस कहा जाता है।

हिन्दू धर्म में दिवाली का त्यौहार

हिन्दू धर्म के अनुसार दिवाली 5 दिन की होती है। इन 5 दिनों की दिवाली का महत्व भी अलग अलग है।

पहले दिन की दिवाली: पहले दिन को धनतेरस कहा जाता है। इस दिन 3 देवताओं की पूजा होती है। धन के देवता , धन्वंतरि जी और यमराज जी। धन्वंतरि जी समुद्र मंधन में अमृत कलश के साथ प्रगट हुए थे। इनके महान आयुर्वेदाचार्य भी कहा जाता है। इस दिन को धनतेरस इसलिए कहा जाता है क्योंकि समुद्र मंथन से जब धन्वंतरि जी प्रकट हुए तो अपने साथ आभूषण और कई प्रकार के धातु भी प्रकट किये। जिस वजह से धातु व आभूषणों को खरीदने की परंपरा शुरू हुई।

दूसरे दिन की दिवाली: दूसरे दिन की दिवाली को नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन श्री कृष्ण जी ने नरकासुर का वध कर 16000 कन्याओं को मुक्त किया था। जब श्री कृष्ण जी आए तो उनके स्वागत में दीपमालाएं की गयी। इसलिए दिवाली वाले दिन दिए जलाये जातें हैं। इस दिन को रूप चौदस भी कहा जाता है क्योंकि यह माना जाता है कि इस दिन उबटन इशनान करने से सौंदर्य में वृद्धि होती है।

तीसरे दिन की दिवाली: तीसरे दिन की दिवाली ही मुख्य रूप से दिवाली मानी जाती है। इसी दिन श्री रामचंद्र जी रावण का वद्द कर 14 वर्षों के वनवास के बाद लक्ष्मण और माता सीता के साथ अयोध्या लौटे थे। उनके स्वागत में अयोध्या वासियों ने दीप जलाए थे और खुशियां मनाई थी।

श्री राम

दिवाली के इस दिन रात्रि को धन की देवी लक्ष्मी की पूजा विधि पूर्वक की जाती है। घरों में दीप जलाए जाते हैं। यह माना जाता है कि इससे धन की प्राप्ति होती है हमारे अंतर्मन में आध्यात्मिक प्रकाश होता है।

चौथे दिन की दिवाली: दिवाली का चौथा दिन गोवर्धन पूजा के लिए विशेष दिन होता है। इस दिन घर के पालतू जानवरों को जैसे गाय, बैल, बकरी को अच्छे से स्नान कराया जाता है औरआंगन में बांधा जाता है। फिर गाय के गोबर से गोवर्धन बनाए जाते हैं और अन् का भोग लगाया जाता है। यह  माना जाता है कि इस दिन द्वापर युग में श्रीकृष्ण जी ने गोकुल वासियों की मूसलाधार बारिश से रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाकर इंद्र देवता का अहंकार तोड़ा था। उसी दिन से गोवर्धनजी की पूजा की जाती है।

पांचवे दिन की दिवाली: दिवाली का यह अंतिम दिन भाई बहन के रिश्ते के लिए महत्वपूर्ण है। इस दिन को भाई दूज के नाम से जाना जाता है। इस दिन बहन अपने भाई की लंबी उम्र के लिए पूजा करती है।

यह माना जाता है कि यमराज जी अपनी बहन यमुना जी से मिलने के लिए जब गए तो उन्होंने प्रेम पूर्वक अपने भाई को भोजन कराया और यह वचन लिया कि हर साल वे इसी तरह से अपनी बहन से मिलने आएंगे और भोजन करेंगे। यमराज जी ने खुशी-खुशी उनको यह वचन दिया और कहा कि जो भी बहन अपने भाई के लिए इस दिन पूजा करेगी उसके भाई की आयु अवश्य लंबी होगी।

निष्कर्ष

दिवाली का त्यौहार एक महान पर्व इसलिए माना जाता है क्योंकि आध्यात्मिक रूप से यह दिन बहुत ही विशेष होता है। यह माना जाता है की दिवाली वाले दिन जितना भी ईश्वरी नाम का आराधन किया जाए वह एक साल के बराबर माना जाता है। यह देखा गया है कि दिवाली वाले दिन बहुत से साधु संत सारी सारी रात जाकर ईश्वर की आराधना करते हैं। यइस दिन एकांत में बैठकर साधना करने से मन बहुत जल्दी एकाग्र अवस्था में आ जाता है।

दूसरी तरफ यह भी माना जाता है की दिवाली की रात्रि को शैतान की पूजा भी बहुत ज्यादा की जाती है। जितने भी जादू-टोने किए जाते हैं वह दिवाली की रात को ही सिद्ध किए जाते हैं। हम सभी को दिवाली वाली रात्रि को पटाखे चलाकर पर्यावरण को दूषित नहीं करना चाहिए। यह महत्वपूर्ण पर्व हमे आध्यात्मिक उन्नति में इस्तेमाल करना चाहिए न की मौज मस्ती में व्यर्थ करना चाहिए।

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