पारस पत्थर, साधु और बाबा श्रीचंद जी की अध्भुत कहानी
सन्यासी और उसके शिष्य अभी कुछ दूर ही गए थे कि उस साधु के कदम एकदम रुक गए। इसका कारण यह था कि उस साधु के पास एक पारस पत्थर का टुकड़ा था। जब भी अपने शिष्यों को भोजन करवाना होता तो वह उस पारस पत्थर से छोटे से लोहे के टुकड़े को छू लेता और सोना बनाकर नगर में बेच देता। बदले में रसद और सामग्री लेता। जिससे वह 360 साधु भोजन करते।